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कुमार शहानी की फिल्म ‘माया मिरर’ के सौ साल | – News in Hindi – हिंदी न्यूज़, समाचार, लेटेस्ट-ब्रेकिंग न्यूज़ इन हिंदी

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फिल्मकार कुमार सहनानी की विशिष्ट पहचान है। विशेष कर समांतर सिनेमा (कला सिनेमा) के वे पुरोधा हैं। दुनिया भर में उनकी चर्चा एक अवां-गार्ड (अवंत-गार्डे) फिल्म के निर्देशन के रूप में हो रही है। पिछली शताब्दी के साठ के दशक में जब पुणे में फिल्म संस्थान की शुरुआत हुई, उन्होंने फिल्मों के एक अन्य प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक, मणि कौल के साथ फिल्म निर्देशन का प्रशिक्षण लिया। संस्थान में उन्हें महान फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक का साहित्य मिला। घटक को वे अपने गुरु मान लेते हैं।

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प्रशिक्षण के बाद पेरिस में शहानी एक फैलोशिप और प्रसिद्ध फ्रेंच फिल्म निर्देशक रॉबर्ट ब्रेसन की फिल्म ‘उन फाम डूस (ए जैंटल वूमन, 1969)’ में सह-विचलित के रूप में काम किया। जब वे वापस लौटे तो भारत ने अपनी पहली फिल्म ‘माया मिरर’ निर्देशित की थी। ‘माया मिरर’ (1972) उनकी सबसे चर्चित फिल्म है, जो पचास साल पूरे कर रही है। यह फिल्म कार्पोरेशन के सहायता से बनी हुई थी।

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हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार निर्मल वर्मा की इसी नाम से लिखी गई कहानी (माया मिरर) पर जब फिल्म बन कर आई, सिनेमा अध्येय लेखकों और समीक्षकों ने निर्देशक की मूल दृष्टि और सिनेमाई भाषा की पहचान की थी। पिछली सदी के 70-80 के दशक में उनकी और मणि कौल की फिल्में (उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दोहरा आदि) में कहानी कहने की प्रायोगिक शैली की चर्चा बहुत हुई। पेरिस के ला मोंड, अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में भी उनकी फिल्मों की चर्चा हुई थी। बहरहाल, ‘माया मिरर’ को हिंदी में ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था।

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‘माया मिरर’ की विशिष्टता की क्या वजह है? हिंदी सिनेमा में इस फिल्म को क्यों मिली अहम जगह? वह अलहदा है कि इस फिल्म में रास और ध्वनी का इस्तेमाल जिस सिनेमा संसार को रचा गया है। पाकिस्तान शायर जिया जालंधरी ने कहा है: ‘रंग चीजें करें और बातों से सुगबुगाहट आई’। कुमार शहानी बातचीत में कहते हैं ‘रंग हमारे होने की गंध को परिभाषित करता है।’ प्रसंगवश, शहानी अक्सर अपने जन्म स्थान लड़काना (सिंध, पाकिस्तान) की चर्चा करते हैं। इसी के साथ ही चट्टानों के मेल और भारतीय सभ्यता और संस्कृति में इसकी केंद्रीयता को रेखांकन करते रहे हैं।

कोलकाता निर्मल वर्मा की कहानी पर आधारित होने के बावजूद यह फिल्म अपना रिकॉर्ड करती है। सिनेमा तकनीकी आधारित कला है, लेकिन तकनीकी यहां के निर्देशक पर हावी नहीं है। ‘माया मिरर’ की कहानी के केंद्र में तरन (अदिति) है, जो अपने पिता (दीवान साहब) और विधवा बुआ के साथ एक छोटे से शहर में रहता है। आजादी के बाद भारतीय समाज में आ रहे सामाजिक बदलाव औद्योगीकरण की आहट इस कहानी में प्रवासी इंजीनियर बाबू के माध्यम से आई है।

इस कहानी के एक प्रसंग में बुआ कहती है: “सोचती हूं, जब आज बाबू तेरे लिए प्रमुख और बड़े घराने की बात चलाते हैं, तो क्या ठीक है? वह बात आज कहां रही, जो साल पहले थी? आज अपना कौन इतना रह गया है, जो बड़े घर का लड़का मिल गया! लेकिन उन्हें यह बात समझाये कौन?” कहानी से अलग इस फिल्म में हाशिया पर पड़ने वाले समाज को भी लेकर आते हैं, जहां उनकी वर्ग-चेतन दृष्टि का पता चलता है। इंजीनियर बाबू के बीच ‘लिटरेसी प्रोग्राम’ चलते हैं। तरन जाति-वर्ग भेद को तोड़ती है।

सामंती और पितृसत्तात्मकता में तरन के अकेलेपन और अवसाद को निर्मल वर्मा की कहानी उकेरती है, लेकिन इस कहानी में तरन अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने का निर्णय नहीं लेती। सामंती साथी की हदबंदियां उसके साथ जुड़ी हुई हैं, जबकि उसके भाई ने उसे निकाल कर तोड़ दिया है। फिल्म में सामंतवाद का विरोध किया। है, जो कहानी में नहीं है। जहां यह सारी बातें फिल्म में कलात्मक ढंग से आई हैं, निर्देशक की ‘फॉर्म’ के प्रति एकनिष्ठता दिखती है।

कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में जब मैंने फिल्म में कहानी से अलग ‘ट्रीटमेंट’ के बाबत उनसे सवाल पूछा था तब उन्होंने कहा था: “मैं ‘माया मिरर’ में सामंतवादी प्रचार दिखाने की कोशिश की है। इस फिल्म के अंत में डांस सीक्वेंस है, उसके माध्यम से मैंने इस उत्तेजना को तोड़ने की कोशिश की है। उस नृत्य में जो ऊर्जा है वह सामंतवादी व्यवस्था के विरुद्ध है। यह काले रंग में भी है।”

कुमार शहानी कहते हैं कि ‘जब आप फिल्म बनाते हैं तब आप एक विशिष्ट काम करने की इच्छा रखते हैं- विशेष कर जब आप स्वतंत्रता की बात करते हैं, जिसकी इच्छा सभी में रहती है।’ एक तरह से व्यक्तिगत स्वतंत्रता इस फिल्म की मूल भावना है। कला में यह स्वतंत्रता किस रूप में आती है, शहानी की यह फिल्म इस बात की खोजबीन करती है।

मणि कौल की तरह ही कुमार शाहीन की फिल्मों में बिंब (इमेज) सायास रूप से भारतीय चित्रों से झलकती हैं। अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह जैसी समकालीन फ़िल्मों में अवांगार्द फ़िल्म के निर्देशकों का स्पष्ट प्रभाव है, जिसे वे खुलेआम स्वीकार भी करते हैं। खुद ‘माया मिरर’ की तरन पर रॉबर्ट ब्रेसां की फिल्म ‘मूशेत (1967)’ के केंद्रीय किरदार का प्रभाव दिखता है, जिसकी आलोचना सत्यजीत रे ने की थी। साथ ही उनकी फिल्मों पर ऋत्विक घटक की फिल्मों का भी प्रभाव पड़ता है। तमाम प्रभावों और आलोचनाओं के बावजूद कुमार शहानी की फिल्मों में कहने की शैली है कि वह उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अलग ही पंक्ति में खड़ा कर देता है।

‘माया मिरर’ फिल्म में ध्वनि के प्रयोग के साथ संगीत के इस्तेमाल पर भी बातचीत की जानी चाहिए। महल के ‘टाइम-स्पेस’ को भास्कर चंदावरकर के संगीत और वाणी जयराम के स्वर ने सुंदरता से अभिव्यक्त किया है। कुमार शाहानी कहते हैं, “जाहिर है, आप देखते हैं कि इस फिल्म के बाद भी मेरी फिल्में ‘म्यूजिकल एपिक्स’ हैं।”

‘तरंग’, ‘कस्बा’, ‘ख्याल गाथा’ और ‘चार अध्याय’ उनकी अन्य चर्चित फिल्में हैं। उनकी फिल्मों पर हिंदी में गंभीर विवेचना की जरूरत है। ये फिल्में भारतीय दृश्यों में पगी हैं, राजनीतिक विचारधारा का समावेश है। असल में, शाहानी दोनों के बीच में ढेर से काम कर रहे हैं।

ब्लॉगर के बारे में

अरविंद दास

अरविंद दासपत्रकार, लेखक

लेखक-पत्रकार। ‘मीडिया का रेखांकन’, ‘बेखुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स’ और ‘हिंदी में समाचार’ पुस्तक प्रकाशित। एफटीआईआई फिल्म एप्रिसिएशन के कोर्स से। जेनू से और जर्मनी से पोस्ट-डॉक्टरल खोज।

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