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जनरल बजाज बोले- 70 साल सियासत करता रहा, अब दखल नहीं देगा- भाषा सुधार नेता | इमरान खान पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा | पाकिस्तान कीखबरें

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कार्यक्षेत्र5 मिनट पहले

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पाकिस्तान के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (सीओएएस) जनरल कमर जावेद बजवा 29 नवंबर को संकोच हो रहे हैं। इसके पहले बुधवार को उन्होंने फेयरवेल स्पीच दी। इस भाषण में जनरल बाजवा ने साफगोई दिखाते हुए माना कि मुल्क की सियासत में 70 साल से दखलंदाजी कर रहे हैं, लेकिन अब कोई नहीं।

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61 साल के बजाज ने सियासतदान और नौकरी करने वालों पर इमरान खान का नाम लिए बिना नसीहत दी। कहा- ये बहुत जरूरी है कि खामियों के बारे में बोलने वाले वक्ता सलीके से शब्दों का चुनाव करें। बजाज के मुताबिक- साल के महीनों में जिस तरह की जुबान का इस्तेमाल किया जाता है, वो बहुत गलत और दुख देने वाला होता है।

इमरान ही निश्चिंत हैं

  • अप्रैल में सत्ता से हारने वाले इमरान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने कब्जा कर लिया और इसके प्रमुख जनरल बजाज को हर सार्वजनिक मंच से एक तरह से गैलियां ही बंधुआ बना लिया। खान फौजों के समर्थन से ही सत्ता में आए थे और जब हर मोर्चे पर नाकाम रहे तो फौजों ने समर्थन देना बंद कर दिया। खान की सरकार गिर गई। इसके बाद ही इमरान जनरल बजाज के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
  • खान ने बजाज को न्यूट्रल, गद्दार, देशद्रोही और जानवर तक कह दिया। हालांकि, कभी सीधे तौर पर नाम कभी नहीं लिया। बजाज ने इसका उल्लेख किया है। कहा- नई सरकार को इम्पोर्ट और सिलेक्ट किया जा रहा है। हमें क्या-क्या नहीं कहा गया। ये बंद होना चाहिए।
  • बजाज ने कहा- मैं आज आखिरी बार देश से बात कर रहा हूं। फौज के 70 साल तक सियासत में दखल दे रहा है। पिछले साल फरवरी में हमने तय किया था कि अब हम सियासी मामलों से दूर रहेंगे। मेरे जाने के बाद भी यह चिलचिली जारी रहेगी।
इमरान खान के साथ जनरल बजाज (दाएं)।  बजाज की वजह से खान प्रधानमंत्री बने थे।  बाद में जब सत्ता चली गई तो बजाज इमरान के निशान पर आ गए।  (फाइल)

इमरान खान के साथ जनरल बजाज (दाएं)। बजाज की वजह से खान प्रधानमंत्री बने थे। बाद में जब सत्ता चली गई तो बजाज इमरान के निशान पर आ गए। (फाइल)

फौजों को विलेन बनाया जा रहा है
बजाज ने आगे कहा- फौज के बारे में गलत बातें फैलाई जा रही हैं। लोगों को भड़काया जा रहा है। इसलिए ही नहीं, जब आलोचना की जाती है तो लहजा और लफ्ज बेहद खराब होते हैं। इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। मैं ये नहीं कहता कि गलतियां नहीं हुईं। और दोष ही क्यों? कोई भी इंस्टीट्यूशन गलतियां कर सकता है। इसमें नेता और सिविल सोसायटी भी शामिल है।

उन्होंने कहा- अब सब आ गया है कि हम अपने स्वार्थी और अहंकारी को कोने में रख लें और सिर्फ मुल्क के बारे में बयान लें। पाकिस्तान इस वक्त बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहा है। हमारी अर्थव्यवस्था सबसे बुरे दौर में है। जरूरत इस बात की है कि सभी सियासी पार्टियां घमंड छोड़कर एक साथ बैठें, पुरानी धारणाओं से सीखें और मुल्क को इन बातों से पहचानें। हमें लोकतंत्र के रास्ते पर ही चलना होगा। सियासत में जीत-हार रही और चलती रही।

1971 की हार का भी जिक्र
जनरल बजाज ने 1971 की जंग में भारत से हार गए और बांग्लादेश के जन्म का भी उल्लेख किया। कहा- मैं नहीं दिख रहा कि 1971 में खामियों को नाकाम कर रहा था। अगर कोई नाकामयाब रहा तो वो हमारे सियासतदान थे। उस समय 92 हजार नहीं, बल्कि सिर्फ 34 हजार सैनिक जंग के मैदान में थे। भारत के 2 लाख 50 हजार सैनिकों के साथ मुक्ति वाहिनी के 2 लाख जवान भी थे। इसके बावजूद हम बहादुरी से लड़े। इसका उल्लेख तब के भारतीय सेना प्रमुख फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने भी किया था।

बाजवा ने भावुक होते हुए कहा- मुल्क की हिफाजत के लिए हम गिरबानियां, और आज हमारे साथ जो कुछ हो रहा है वो नौइंसाफी है। जो शहीद हुए हैं, मैं उन्हें सलाम पेश करता हूं।

बजाजा 6 साल सेना प्रमुख रहे। 2016 में उन्होंने फौज की कमान संभाली थी। एक संविधान संशोधन के बाद उन्हें 3 साल का समावेश मिला। अब उन्हें एक और प्रसंग दिया गया था, लेकिन वे समान रूप से समान लगते हैं।

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