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डायरी में लिखी पिता और बेटियों की सुसाइड की दास्तान: लिखा- एक जिंदगी इतनी निर्दयी मत बन, मेरी सारी खुशियां छीन लीं; कृपया मुझे बख्श दो

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गोरखपुर35 मिनट पहलेलेखक: उत्कर्ष श्रीवास्तव

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मंगलवार की सुबह पिता और दो नाबालिग बेटियां जिंदगी से तंग आकर सुसाइड कर लीं। बेटियों के शव के पंखों के टूटने से दुपट्टे से लटके थे, जबकि पिता दूसरे कमरे में पंखों पर लटका हुआ था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी सुसाइड की पुष्टि हुई है। मृत के शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं मिले हैं। गले में लटक रहे हैं कि लटका कर गला कैसे से मौत की वजह सामने आई है।

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ये सब पढ़ने के बाद आपके जेहन में सवाल कौंधा होगा कि असली सुसाइड ही क्यों? उत्तर है मान्या की लिखी डायरी के कुछ पन्ने।

  • आइए जानते हैं मान्या ने डायरी में क्या लिखा…

माना दैनिक अपनी पर्सनल डायरी में दर्द भरा दास्तान लिख रहा था।

कठोर जीवन: कर मेरी सब खुशियाँ छिन लीं
“एक जड़ंगी मेरे साथ इतनी निर्दयी मत बनो, मैं इतना मजबूत नहीं हूं, कृपया मुझे बख्श दो, मैंने घन सबसे सख्त रूप में देखा है। लेकिन, तुम मुझे कभी संघर्ष में संकोच नहीं करते। यहां तक ​​कि मेरे मां-बाप को भी टॉर्चर किए। उन जंजीरों से वन नहीं दिया। उन्होंने सबसे कठिन चुनौतियों का सामना किया। उनके चेहरे पर मुस्कान के साथ और जब मेरी मां ने दम तोड़ दिया, तब भी किसी को दूसरा मौका नहीं दिया। मेरी सबने देखा। खुशियां खोली।”

मां से बहुत प्यार करती थी मान्या
“वो मेरी मां थी जिसे खींचा हुआ मेरे। अब मेरे पापा हम सब के लिए जूझ रहे हैं। तुम बहुत निर्दयी हो। बहुत कठिन है। मुझे थोड़ी सी खुशियां दे दो। सभी के जीवन में समस्या होती है, मुझे पता नहीं है कि वो कैसे जीते हैं। मैं आपस में मिलना चाहता हूं, पर समस्याओं की एक लंबी कड़ी है। ‘ए लाइफ, मेरे साथ इतनी निर्दयी मत बनो ‘ मैं मजबूत नहीं हूं, कृपया मुझे बख्श दो।”

दोनों छात्राओं को स्कूल में श्रद्धांजलि दी गई।  इस दौरान साथी छात्रों और शिक्षकों के चेहरे पर बुरा साफ देखा जा सकता था।

दोनों छात्राओं को स्कूल में श्रद्धांजलि दी गई। इस दौरान साथी छात्रों और शिक्षकों के चेहरे पर बुरा साफ देखा जा सकता था।

जीवन ने स्थूल समस्या है
मान्यता अपनी जिंदगी में बहुत दर्द देने वाली थी। उसने अपनी डायरी में दूसरे पन्ने पर लिखा है, “जिंदगी बहुत निर्दयी है। इसने मुझे किसी समस्या की समस्या दी। इसके बावजूद भी हमने अपने आपको मजबूत बनाया। ताकि हम यह न सोचे कि मैं ही क्यों। बल्कि हम चुनौती का सामना करेंगे।”

रोती हूं तो आंखे दर्द होती हैं…
इसी तरह तीसरे पन्ने पर लिखा, “मेरा दिल अब पत्थर का हो चुका है। जब मैं रोती हूं मेरी आंखों में दर्द होता है। फिर मैं रोती हूं मेरा सिर फटता है। जिंदगी में पीड़ित, दुखी, रोना, अपमान को कोई नहीं देखता। इस पूरी दुनिया में कोई नहीं ऐसा नहीं है जो मुझे समझ सकता है।

दोस्त ने भी मान्यता की गारंटी दी थी
इसी तरह चौथे पन्ने पर लिखा है, “मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि जिसे मैं अपना दोस्त मानती थी वो मेरे और मेरी फैमिली के बारे में ऐसी सोचती थी। मुझे लगता था कि वो मेरे से बात नहीं कर रही है। तो वो किसी टेंशन में होगी। पर नहीं। सभी के जैसे उनकी सभी जैसी ही वाणी थी कि हम बिना मां के बच्चे हैं, और गुस्सा काम करेंगे। वो ऐसा कैसे सोच सकती है?”

  • डायरी के आखिरी पन्ने

…कृपया डायरी ये बातें किसी से मत कहना
“एक बार फिर जिंदगी का पहिया फिर एक मोड़ पर आया जहां मुझे लगा कि मैं अपनी जिंदगी खत्म कर लूं, कौन हैं वो लोग जो मेरी फैमिली को बर्बाद करना चाहते हैं। हां मुझे पता है कौन हैं वो लोग, लेकिन वो क्यों हमें खुश करते हैं।” नहीं देखना चाहते हैं। हे भगवान अब मैं और नहीं लिख सकता हूं। मैं अपने कार्यक्रम को रोक रहा हूं। मेरा दम घुट रहा है। कृपया डायरी…कृपया ये बातें कभी किसी को मत बताएं। मैं खुद से इन विचारों को बताता हूं। मुझसे दोस्ती करें

नोट में दोनों तोतों को पिंजड़े से उड़ाया गया है।  लिखा था 'पैब्लो वी लिलि को फ्लाई गोई'।

नोट में दोनों तोतों को पिंजड़े से उड़ाया गया है। लिखा था ‘पैब्लो वी लिलि को फ्लाई गोई’।

मरने के बाद भी बेजुबानों का फिक्र
वहीं, घर में तोतों के पिंजरों के पास से एक नोट मिला तो कमरे से सुसाइड करने वाली होस्ट की डायरी भी मिली है। इस बेटी को अपने परिवार के साथ ही तोतों से भी इतना प्यार था कि उसकी मौत के बाद भी इन बेजुबानों का फिक्र हुआ था। नोट में दोनों तोतों को पिंजड़े से उड़ाया गया है। लिखा है ‘पैब्लो वी लिलि को फ्लाई गोड’।

4 अनजाने में लिखना जीवन का दर्द
वहीं, पूरे परिवार ने सुसाइड करने से पहले तोते के पिंजड़े को कपड़े से कंपेयर किया था। शायद मरने को गले लगाने वाली बेटी नहीं चाहती थी कि वह जिन तोतों को चार साल से पाल रही है, वो उन्हें तड़प-तड़पकर दम तोड़ता देखें।

पुलिस की जांच में डायरी और नोट पर हाथ से लिखी हुई बड़ी बेटी को पहचानने की थी। सिटी सेंट्रल एकेडमी स्कूल की क्लास 9 में पढ़ने वाला रोजाना अपनी पर्सनल डायरी में दर्द भरी दास्तां लिख रहा था। इस डायरी के चार भेद में उसने पूरे जीवन का दर्द लिखा है।

  • इस सामूहिक सुसाइड की वजह भी जानेंगे, लेकिन इससे पहले जानिए पूरी घटना..

पिता और दो बेटियों ने किया सुसाइड

ये तस्वीर मान्यताएं और स्कूल फैंटेसी के दौरान इंसानी हैं।

ये तस्वीर मान्यताएं और स्कूल फैंटेसी के दौरान इंसानी हैं।

इस सामूहिक आत्महत्या की घटना में शाहपुर के घोसीपुरवा में स्थित शाहपुर इलाके के गीता वाटिका में मंगलवार की स्थिति हुई। ओम प्रकाश श्रीवास्तव मूलत: बिहार के गुठनी थाना क्षेत्र सिवान के रहने वाले हैं। गोरखपुर के घोसीपुरवा में 30 साल से घर बनवा रहे हैं। वह प्राइवेट गार्ड हैं।

ओम प्रकाश (60) के साथ जितेंद्र श्रीवास्तव (45) अपनी दो बेटियों काफी सटीक रूप से रिया (16) और मानवी श्रीवास्तव उर्फ ​​जिया (14) के साथ रहते थे। बगल में जितेंद्र का भाई है। जितेंद्र की पत्नी की दो साल पहले कैंसर से मौत हो चुकी है। कुछ साल पहले जितेंद्र का एक पैर ट्रेन से कट गया। वह कृत्रिम पैर टूट गया था और घर में टेलरिंग का काम करता था।

मेन गेट का खुलासा किया था
मंगलवार सुबह पिता ओम लाइट नाइट ड्यूटी करके घर पहुंचे। ओम प्रकाश मंगलवार सुबह जब लौटा तो पहले से खुला था। वह अंदर पहुंचा तो चीख पड़ी। एक कमरे में उनकी दोनों पोतियां मान्या और मानव के शव लटके हुए थे। दूसरे कमरे में बेटे जितेंद्र का शव लटका हुआ था।

यह पिता ओम प्रकाश हैं।  रात को ड्यूटी पर गए थे तो सब कुछ ठीक था।

यह पिता ओम प्रकाश हैं। रात को ड्यूटी पर गए थे तो सब कुछ ठीक था।

मोहल्ले से लेकर स्कूल तक में छाया मातम
शाहपुर का नया मोहल्ला मंगलवार को ओझल हो गया। मंगलवार की सुबह हुई और सूरज भी अपने समय से चमकने लगा। बस नहीं थी वो मान्या और मानवी की चहहाहट। जो हर सुबह आस-पास और उनके दादा जी को खुश करते थे। पिता के साथ दोनों बेटियों की सुसाइड कर लेने से पढ़ाई में रहने की मान्यता और मानवी का स्कूल भी ओझल हो गया।

प्रिंसिपल, टीचर्स और साथ पढ़ने वाले छात्रों को जब ये बात पता चली तो सभी की आंखें नम हो गईं। स्कूल प्रबंधन ने भी दो बच्चियों की बड़ी सी फोटो पर आरोप लगाया। उसी के साथ स्कूल में कुछ देर से पढ़ाई हुई इसके बाद वहां छुट्टी कर दी गई।

मान्यता को मिले 86.66% अंक
शाहपुर स्थित सेंट्रल एकेडमी की प्रिंसिपल निवेदिता कौशिक ने बताया, मान्य श्रीवास्तव स्कूल में पढ़ाई के साथ ही स्पोर्ट्स में भी अव्वल थी। अभी स्कूल में दस्तावेज़ीकरण हैं। जिसमें मान्यता को 86.66% अंक मिले हैं। वो स्कूल में चौथी पोजीशन पर थी। इसी तरह करीब 14 साल की छोटी बहन हमनी श्रीवास्तव इसी स्कूल में 7वीं क्लास में पढ़ती थी। मानवी को एजाजम में 73.9% मार्क्स मिले थे।

मंगलवार को जैसे ही मान्यता और इंसानी मौत की खबर स्कूल पहुंची, स्कूल में पढ़ने वाले दोस्तों की आंखें नम हो गईं।

मंगलवार को जैसे ही मान्यता और इंसानी मौत की खबर स्कूल पहुंची, स्कूल में पढ़ने वाले दोस्तों की आंखें नम हो गईं।

जिस मंच पर श्रद्धांजलि दी गई, उसी पर 24 घंटे पहले गा रही थी
सोमवार को सभी स्कूलों में बाल दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। इसी तरह सेंट्रल अकादमी स्कूल में भी कई प्रोग्राम हो रहे हैं। सोमवार को स्कूल में सभी बच्चों के साथ मान्या ने ग्रुप सॉन्ग में हिस्सा लिया था। मान्या जब हाथ में माइक लेकर गाना गा रही थी, तब उसकी छोटी बहन दर्शक दीर्घा में दर्शक ताली बजाकर बड़ी बहन का हौसला बढ़ा रही थी।

स्कूल का सब्सक्रिप्शन भी बाकी था
मानवी और मान्यता के घर से एक और पत्र मिला है। जोसिस्टेंस में लेट होने की बात लिखी गई है। स्कूल से निवेदन है कि बच्चों की पढ़ाई जारी रखें। पैसा ही सॉफ्टवेयर सागर दी जाएगी। वहीं स्कूल प्रबंधन का कहना है कि ऐसा कोई पत्र यहां नहीं दिया गया था।

ओरली रिक्वेस्ट आई थी, तब स्कूल प्रबंधन ने भी उन्हें सहूलियत से शिक्षा जारी रखने के लिए कहा था। जबकि, घर में सिलाई कर पूरे परिवार का खर्च चलाने के साथ ही मान्या का स्कूल लाइसेंस 4,230 रुपये और मानवी के 3,156 रुपये था।

ये तस्वीर जितेंद्र और मान्यता की है।

ये तस्वीर जितेंद्र और मान्यता की है।

बड़ी बहन ने अटेंड के पैरेंट टीचर्स सही
स्कूल में अभी हाल ही में पैरेंट टीचर्स थे। जिसमें पैरेंट्स का आना जरूरी था। इस बीच मान्या ने स्कूल में एक आवेदन दिया। अप्लीकेशन में लिखा था कि मेरे पापा के पैर में परेशानी है, इस वजह से वो गलत अटेन्ड नहीं करेंगे। इस पर टीचर ने बड़ी बहन को माना था कि वो छोटी बहन मानने के पैरेंट्स गलत तरीके से अटेंड कर लेगी। ऐसा ही हुआ जब मेसेज हुआ तबा पैरेंट्स छोटी बहन के टचर्स से मिले।

घर में थोड़ा-थोड़ा बनाया, लेकिन किसी ने नहीं खाया
वहीं, इस सामूहिक सुसाइड से पहले ऐसा आत्मघाती कदम उठाने के परिवार में कोई योजना नहीं थी। शायद यही वजह थी कि एक दिन पहले सोमवार को बाल दिवस पर सांस्कृतिक कार्यक्रम में दोनों ने भाग लिया था। वहीं, कार्यक्रम से लौटने के बाद दोनों बेटियों ने लिट्टी और मुलाकात की। दादा ओम प्रकाश खाना खाकर काम पर चले गए। लेकिन परिवार में किसी और ने खाना नहीं खाया। इसी बीच कुछ ऐसा हुआ और पूरे परिवार ने सुसाइड कर लिया।

आइए जानते हैं इस सामूहिक सुसाइड की वजह…

अपने दादा-दादी के साथ वास्तव में बिल्कुल सही जिया।

अपने दादा-दादी के साथ वास्तव में बिल्कुल सही जिया।

परिवार पर टूट पड़ा मुसीबतों का पहाड़
जितेंद्र और उनके परिवार को शायद किसी की नजर लग गई थी। साल 1999 में गांव से गोरखपुर आते समय मैरवा स्टेशन पर ट्रेन से उनका एक पैर कट गया था। कृत्रिम पैर के घाव थे घर में ही सिले करते थे, जबकि उनकी पत्नी सिम्मी कैंसर से पीड़ित थीं। कोरोना काल में इलाज के अभाव में सिम्मी का कैंसर से दो साल पहले मौत हो गई।

अभी जितेंद्र के सीने में पत्नी का इलाज नहीं कराएं मौत का दर्द शांत भी नहीं हुआ था कि कुदरत ने करीब 6 महीने पहले अपनी मां को भी ले लिया। घर में बीमार मां की भी मौत हो गई। परिवार में दो सदस्यों की मौत के दर्द के साथ जितेंद्र के साथ बेटियों की पढ़ाई और परवरिश की जिम्मेदारी बढ़ती चली गई।

इलाज नहीं मिलने से बढ़ रहा था जितेंद्र के पैर का दर्द
वहीं, इस बीच जितेंद्र के पैर का भी ठीक इलाज नहीं होने की वजह से उन्हें काफी तकलीफ हो रही थी। पैर का दर्द लगातार बढ़ रहा था। लेकिन मौज की तंगी की वजह से बेहतर इलाज भी नहीं हो सका।

परिवार बनाना कठिन हो गया है
वहीं, परिवार चलाने के लिए जितेंद्र घर में ही साड़ी का काम करते थे। जबकि उनके बुजुर्ग पिता साझेदारी गार्ड की नौकरी करते हैं। पूरा परिवार कर्ज में डूब गया था। ऐसे में जितेंद्र पर परिवार और जरूरतों के अलावा सबसे ज्यादा बोझ बेटियों की पढ़ाई का पड़ रहा है। इसी वजह से बेटियों का स्कूल भी बाकी था। हालांकि छोटी बेटी हमारी इन बातों को पूरी तरह नहीं समझती थी, लेकिन बड़ी बेटी मान्यता अपने पिता के संघर्ष से टूट गई थी।

जितेंद्र गोरखपुर में 30 साल से परिवार के साथ रह रहे थे।  यह मकान प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी के तहत बना है।

जितेंद्र गोरखपुर में 30 साल से परिवार के साथ रह रहे थे। यह मकान प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी के तहत बना है।

परिवार कर्ज में डूब गया था
इस बीच पत्नी और मां की मौत के बाद रास्ता टूट गया जितेंद्र अपनी बेटियों की परवरिश में कोई कमी नहीं रखना चाहते थे। बेटियों की पढ़ाई और परिवार की साख के लिए वे लगातार कर्ज लेते चले गए। उन्होंने मोहल्ले में कमेटी वाली महिला कमेटी का पैसा रखा था, जिसे किश्त भी सागर करना मुश्किल हो रही थी।

इसके अलावा जितेंद्र के ऊपर बैंक का भी कुछ कर्ज है। हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री आवास से 2.50 लाख रुपए दिए और बाकी के कर्ज लेकर मकान भी बनवाया था। हालांकि परिवार पर कुल कितना कर्ज था, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

अपनों ने भी तोड़ दिया नाता
इसलिए ही नहीं, जितेंद्र के घर के ठीक बगल में उनके छोटे भाई निकुंठ का भी परिवार रहता है। लेकिन बुरे वक्त में सिर्फ भाई ही नहीं बल्कि सभी संबंध और पेशों ने भी जितेंद्र और उनके परिवार से नाता तोड़ दिया था। परिवार के लोगों के मुताबिक, बुरे वक्त में रिश्ते जुड़े तक में जितेंद्र और उनके परिवार को नहीं बुलाते थे। ऐसे में आर्थिक तंगी के साथ ही पूरा परिवार मानसिक और सामाजिक पूर्णता भी प्राप्त कर रहा था।

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