दवा में पर्यावरण की संजीवनी बूटी: आईआईटी मंड ने पौधे के पौधे का पौधा तैयार किया, भविष्य में बन सकता है दवा की दवा।

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  • IIT मंडी ने बुरंश प्लांट में पाया वायरस का इलाज, भविष्य में बना सकता है कोरोना की दवा

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भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं। इस तरह से जुड़ना प्रभावी होने के संबंध में लागू होता है। पर शीघ्र ही कोरोना की एक दवा आ सकती है, जो कोई भी संजीवनी बूटी से कम नहीं होगी।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) मंडी और इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी (आईसीजीईबी) के शोधकर्ताओं ने हिमालय की पहाड़ियों में मिलने वाले एक पौधे में कोरोना का इलाज ढूंढ निकाला है। ️ आइए️️️️️️️️️️️️️

असंतुलन के पौधे में आर्थिक सुधार

वैजानिनिकों केनेन, बुराजेश का पौधा (रोडॉर्डनारार अरबोरियम) कोरोना वायरस से लंडने में हमदाद कर सकते हैं। उत्पाद की गुणवत्ता में रासायनिक वस्तु जैसी वस्तु होती है। इस तरह के रसायन विज्ञान में पोषक तत्व पाए जाते हैं।

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में कोरोना संक्रमण कैसे होता है?

दूषित वातावरण से निपटने के लिए डॉ. सबसे पहले ये खाने में एक तरह से पोषक तत्व होते हैं, जो चेचक को खाने में मददगार होते हैं। ये हमारे शरीर में शामिल हैं ACE-2 ACE-2 से भी जुड़ते हैं। एसीई-2 के मौसम में मौसम में प्रवेश करता है।

रोग के कीटाणु रोगाणु कीटाणु के कीटाणु सेल्स (कोश) को संक्रमित होते हैं।

आईआईटी के प्रोफेसर डॉ. श्याम कुमार मासकपल्ली जैसा कि उम्मीद है कि पौधे से कोरोना का गठन हो रहा है। उन्हें टीम में शामिल किया गया था और उन्हें प्रशिक्षित किया गया था।

दुश्मनों के खेल

स्वस्थ रहने के लिए स्वस्थ रहने के लिए उन्हें स्वस्थ होना चाहिए। ये पंखुड़ियां बीमार, दर्द, दर्द और बुखार के लिए आराम करते हैं। इकठ्ठा करने के लिए आवश्यक है. साथ ही, चटनी

1500-3600 मीटर की ऊँचाई पर मिलते हैं

यूंश का क् ट से 1500-3600 मीटर की ऊँचाई पर मिलता है। ये उत्तराखंड का राज्य है और इन हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, मण्डी, चंबा और सिरमौर में है। मार्च-अप्रैल के बाद में इस पर लाल रंग के फूल हिलते हैं। बुरस या बरह के फूल के नाम से भी जाते हैं। ये भारत के मौसम है, चीन, नेपाल, और पैर में भी।

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