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दास्तान-गो : रीटा फ़ारिया ने मज़ाक-मज़ाक में ही सुष्मिता, ऐश्वर्या, तस्वीर को ज़मीन देखते दे दी और फ़िट… – दास्तान गो व्हेन रीता फारिया वोन मिस वर्ल्ड टाइटल सुष्मिता सेन ऐश्वर्या राय प्रियंका चोपड़ा – News18 हिंदी

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता है। या न भी होता है। पर एक बात जरूर होती है। किस्से, कहानियां रुचते रोमांटिक हैं। वे लोगी तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हो, बीते दौर के हो, तो भी बुराई नहीं। क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताते ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं। अपने दौर की याद दिलाते हैं। गंभीर से मसलों की घुटी भी दूध कर के, हौले से पिलाते हैं। इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाएं का शिल। कोशिश यह स्थिर जारी रहे। सोमवार से शुक्रवार, रोज…

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जनाब, हिन्दुस्तान में जब भी हरनाज़ संधू, मानुषी छिल्लर, प्रिटिकल चोपड़ा, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, जैसी सुंदरियाँ ‘मिस-वर्ल्ड’, ‘मिस-यूनिवर्स’ या ‘मिस-अर्थ’ हैं, जैसा कोई ताज़ जीतती हैं तो बड़ी सुर्ख़ियाँ बनती हैं। ये सुर्ख़ियों में दो-तीन झटके तरीके से करते हैं। ये पहली बार जिनके सिर पर ताज़ रखा गया, उन्होंने इसकी तैयारी कैसे की। क्या खाया-पिया. कितने मेहनत की. वग़ैरा, वग़ैरा। और दूसरी ये सुर्खी भी साथ में चलाती है कि इन सुंदरियों की ऐसी कामायबी के लिए जमींदार तैयार की थी। यानी पहली मरतबा किसे इस तरह की सौंदर्य प्रतियोगिता का ताज़ अपने सिर पर सजावट का मौका मिला। और इस दूसरी फिल्म सुरख़ी के साथ एक ही नाम हमेशा उभर कर सामने आता है, रीटा फ़ारिया का। जिन्होंने 1966 में आज के रोज़ यानी 17 नवंबर को लंदन में ‘मिस वर्ल्ड’ का ख़िताब अपने नाम किया था। वह भी बिना किसी तैयारी के, मज़ाक-मज़ाक में।

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जी जनाब, रीटा फारिया के लिए ‘मिस वर्ल्ड’ के ख़िताब तक का सफ़र महज़ मज़ाक में ही शुरू हुआ था। और वैसे अटक में यह फिल्‍म फंस गया, फंस गया पहले से किसी मुक्कमल तैयारी का तो सवाल ही नहीं उठता। ऐसे में, बड़े दिलचस्प मोड़ से उनका यह सफ़र। बात उन दिनों की है, जब रीटा बंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं। उन्हें डॉक्टर बना था और पूरा ध्यान, पूरी तैयारी उसी तरफ थी। हालांकि नैन-नक़्श आकर्षण दिए थे ऊपर वाले ने। तो वही ज़हन में रखते हुए एक बार किसी सहेली ने यूं ही मज़ाक-मज़ाक में कहा, ‘सुना तूने? बांबी में ब्यूटी कॉन्टेस्ट हो रहा है। इस बार की ‘मिस बॉम्बे’ तारीख जाएगी। तू भी क्यों नहीं भेजेगा अपनी तस्वीर?’ ‘मैं? मैं क्या कर रहा हूं? मुझे बस यही न मॉडल-वॉडल या कोई हीरोइन-वीरोइन बनना है। नहीं, नहीं’। ‘अरे न भेजें, बस एक तस्वीर तो भेजें, जैसा कि टेरर है?’

और समय की बात देखिए जनाब कि उस वक्त रीटा के पास उनकी एक स्टाइल की तस्वीर भी नहीं थी, जिसे वे प्रतियोगिता के लिए ‘गलत’ करार देने के लिए तैयार रखते हैं। उन्होंने ही ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ अख़बार को एक बार बताया था, ‘सहेली ने कहा तो मैंने भी सोचा कि क्यूं न तजरबा कर के देख लिया जाए। लेकिन मेरे पास मेरी कोई अच्छी तस्वीर नहीं थी। तब मेरी बड़ी बहन फिलोमिना मुझे एक स्टूडियो लेकर गईं। वहां मेरी कुछ तस्वीरें ली गईं। मैंने उन्हें प्रबंधकों को भेज दिया। इत्तिफाक से मुझे बुलाया गया, उस प्रतियोगिता के लिए। और यूं ही करते-करते मैं ‘मिस बॉम्बे’ बन गई। ये साल 1966 की ही बात है। उस दौर में प्रत्येक साप्ताहिक पत्रिका होती थी। वही प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। इसके बाद भी लोगों ने ‘मिस इंडिया’ प्रतियोगिता आयोजित की। मैं भी जीत गया। इसके एवज में पहले मुझे 5,000 और फिर 10,000 रुपए मिले’।

रीता फारिया

‘इनाम में मैंने पूरी राशि मां को दी। ताकि वे जो अनाथालय चले गए, वहां ये पैसे बच्चों के कुछ काम आ जाएं। पर मेरे सामने नई मुश्किल आ पड़ी। अब ‘मिस इंडिया’ बनने के बाद मुझे लंदन जाने को कहा गया। ताकि वहां होने वाली ‘मिस वर्ल्ड’ प्रतियोगिता में हिन्दुस्तान की नुमाइंदगी दृष्टिगोचर हों। अब तक उस प्रतियोगिता में मेरा पहला हिन्दुस्तान से जुड़ा हुआ एज़िकेल को ही जाने का मौका मिला था। साल 1959 में। लेकिन मेरे सामने दिख रहा था कि वहां जाने के लिए मेरी अलमारी में ढंग के कपड़े नहीं थे। यहां तक ​​कि देश से बाहर जाने के लिए पास भी नहीं था। ऐसे में इस तरह की प्रतियोगिता के लिए कोई फॉर्मल ट्रेनिंग वगैरा ले लेने का तो सवाल ही कहां था। उस काम मेरी मां ने झल्दी-जल्दी में कुछ कपड़ों को बंद कर दिया। मैंने एक व्यंजन से प्रामाणिक और अभिनेत्री पर्सिस खंबाटा से उनका बाथिंग-सूट लिया’।

‘आँगकों को पता चला कि मेरे पास पासपोर्ट नहीं है तो तुरत-फ़ुरत वे इंतज़ाम रजिस्टर हैं। इस तरह जोड़-तोड़ तोड़कर मैं किसी तरह लंदन पहुंचता हूं। यहां पोर्टपोर्ट में मेरे, इसी तरह प्रोफाइल किए गए कुछ कपड़े थे। लिटिल सी मेक-अप किट और राशि के नाम पर कुल तीन पाउंड, जो शुरुआत में ही ख़र्च करने गए। दरअस्ल हुआ, यूँ कि जब मैं वहाँ पहुँचा और एक अहम स्थान पर मैंने पर्सिस का बाथिंग-सूट पहना तो वह मेरे लिए छोटा पड़ गया। क्योंकि पर्सिस ऊंचाई में थोड़ी देर कम थी। इसी तरह की दिक्कत हील वाली चप्पलों को लेकर थी। प्रबंधकों ने इस ओर ध्यान दिया तो मुझे फिर नया बाथिंग सूट और जूते-चप्पल वग़ैरा ख़रीदने पड़ गए। ख़ैर, जैसे-तैसे बंद कर दिया। लेकिन फिर भी मैं वहां से बाहर की तरह महसूस कर रहा था। क्योंकि बाकी लड़कियों के पास अच्छे कपड़े, जूते वगरा तो थे ही, वे प्रशिक्षित भी थे पूरी तरह’.

‘रही मेरी बात, तो ये भी नहीं पता था कि मुझे क्या होना चाहिए और क्या नहीं। फिर भी, किसी तरह शिशिल आगे बढ़ता जा रहा है। लंदन में वेलिंगटन स्ट्रीट के लिज़ियम बॉलरूम में ‘मिस वर्ल्ड’ प्रतियोगिता हो रही थी। कुल 66 लड़कियां शामिल थीं। सट्टेबाज कुछेक लड़कियों की जीत पर शर्तिया दांव लगा रहे थे। और मुझे पता चला कि मेरी जीत पर एक आदमी ने दांव खेला है। वह एक हिन्दुस्तानी था। शायद हिन्दुस्तानियत की राज में बहकर उन्होंने मुझ पर दांव लगाया होगा। पर जैसी-जैसे प्रतियोगिता आगे दी जाएगी मेरी भी देयताएँ बढ़ती जाएँगी। मेरी उम्र वह 23 साल ही थी लेकिन मुझे ये एहसास था कि मैं कुछ बड़ा कर रहा हूं। इसी एहसास और भरोसे के साथ जब स्विम-सूट पहनकर मैं पर जाऊं तो शायद तब पहली हिंदुस्तानी थी, जिसने ऐसा किया। उस प्रतियोगिता के दौरान चिकित्सा संबंधी आकर्षण भी मेरे लिए मददगार साबित हुआ’।

रीता फारिया

‘ख़ास तौर पर अंतिम दौर में, जब जीत-हार का फ़ैसला करने वाले जज तरह-तरह के सवाल करते हैं, तब मेरा मेडिकल चांस ही था, जिसने मुझे बाकी सभी से अलग लाकर खड़ा किया। वे मुझसे…आप आगे क्या बनना चाहते हैं? तो मैंने कहा- डॉक्टर साहब। मैं महिलाओं की डॉक्टर बनना चाहता हूं। भारतीयों में महिलाएं सुरक्षित मातृत्व धारण कर सकती हैं, इसके लिए अच्छे डॉक्टरों की सख़्त होने की संभावना है, इसलिए। इस पर जजों ने जंकिया लहज़े में फिर सवाल किया- हिन्दुस्तान में वैसे ही काफ़ी बच्चे पैदा होते हैं? तब मैंने तुरंत उनके कमेंट का संयोजन- हमारे यहां पैदा हो रहे बच्चों का तादाद कंट्रोल करने के लिए भी अच्छे डॉक्टरों की घोषणा की है… मेरे इस ज़वाब ने सभी को निरुत्तर कर दिया।’ इस सवाल-जवाब के बाद जनाब, जो हुआ वह तारीख में दर्ज है। रीटा ने ‘मिस वर्ल्ड’ यानी कि ‘विश्व सुंदरी’ का ख़िताब अपना नाम लिया था।

उस ‘मिस वर्ल्ड’ का ख़िताब जीतने वालीं रीटा पहली हिंदुस्तानी ही नहीं, प्रथम एशियाई भी थीं। यानी वे हिन्दुस्तान की ही नहीं, पूरे एशिया महाद्वीप की लड़कियों के लिए ऐसी साएंद्र्य-प्रतियोगिताओं तक पहुंचें, जीत और फिर इसी तरह के क्षेत्रों में करियर बनाने की जमीन तैयार कर के दे दी थी। मगर दिलचस्प ये कि उन्होंने जिस तरह फक-मज़ाक में उस ज़मीन पर क़दम रखा, वहाँ परचम फ़हराया, वैसे ही हंसते-मुस्कुराते उसे छोड़ भी दिया। हमेशा के लिए। इस बाबत को भी फटा रीटा से जानते हैं, ‘एक काम जब मैं डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था तो मुझे कोई नहीं जानता। मगर अगले ही पल जब मैं ‘मिस वर्ल्ड’ बनी तो पूरी दुनिया मुझे जानने लगी। मेरे बारे में जानने की कोशिश करने लगी। इससे मुझे एहसास हुआ कि ये चमक-दमक, ये नाम-शोहरत, कितनी फाइलें और दागी (अस्थायी) है। ये सब मुझे नहीं चाहिए था। सो छोड़ दिया’।

हालांकि, एक साल तक रीटा उनका मनमाफिक डॉक्टरी समुदाय में नहीं लौटा। क्योंकि वे ‘मिस वर्ल्ड’ के तौर पर करार से बंधी थीं। उनके निकट पूरी दुनिया में तबाही मचाने वाली जगहें बन रही थीं। वहां उन मकसदों का प्रचार होता था, जो उन्हें बताते हैं। इसी स्थिति में एक बार उन्हें वियतनाम जाना पड़ा। वहां लड़ रहे अमेरिकी सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए। इससे विवादित हैं कि हिंदुस्तान की, तब की, सरकार कुछ ख़फ़ा हो गई थी। लेकिन इससे रीटा को कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई। बात आई और निकल गई। और फिर एक दस्तावेज़ वह आया, जब ‘मिस वर्ल्ड’ के तौर पर हुए क़रार से रीटा भी निकल गए। तय समय पूरा हो जाने के बाद। यहां से उनके सामने दो रास्ते थे। एक-वे स्पेक्ट्रम, फ़िल्म वग़ैरा की चमक-दमक से भरी दुनिया में आगे बढ़ती जा रही हैं। और जैसा कि उन्होंने ही कहा- ‘झूठी शान-आन’ और ‘वक़्ती दौलत-शोहरत’ कमाएँ। जो कि ज्यादातर लड़कियां करती हैं। या फिर दूसरा- उपलब्धि में कुछ सच्ची धारणाएँ प्राप्त करें अपने लिए’।

जनाब, रीटा ने दूसरा रास्ता चुना। सच्चा सच का। उन्होंने ‘मिस वर्ल्ड’ के तौर पर जो सैर-सपाटा, उनकी मदद से लंदन के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में दाख़िला लिया। यहां उन्होंने फिर एक तारीख की मिसाल की। क्योंकि वे पहली बार ‘मिस वर्ल्ड’ थे, और शायद आज भी हैं, जिन्होंने डॉक्टरी को अपना लिया था। डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी होते-होते रीटा को वहीं, मेडिकल कॉलेज में ही, अपने हमसफर मिल गए। डॉक्टर डेविड पॉवेल, जिससे उन्होंने शादी कर ली। साल 1971 में। इसके बाद आज डॉक्टर पॉवेल और रीटा अपने इलाके-पूरे परिवार के साथ आयरलैंड के डबलिन शहर में रहते हैं। लोगों की मदद करते हैं। उनके मर्ज़ का इलाज करते हैं। और भाईचारे की देखभाल करते हैं। वैसे, परिवार की बात आई तो बता दें कि रीटा की दो बेटियां हैं- डायड्री और एन मैरी। और नाती-नातिन हैं। खुशहाल।

बस, आज के लिए इतना ही. फ़िज़ा हाफ़िज़।

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