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प्रचार का शोर कम: गुजरात में सिर्फ नेताओं का हल्ला, जनता खामोश; जनसभाओं में भी वैसी रौनक नहीं

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  • गुजरात में सिर्फ नेताओं का वार, जनता खामोश; जनसभाओं में भी ऐसा उत्साह नहीं है।

नई दिल्ली4 मिनट पहले

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गुजरात चुनाव में इस बार खुले नेता बोल रहे हैं। जनता ख़ामोश है। ज्यादा जगह तो जनसभाओं में भी पहले जैसी रौनक नहीं है। कुल मिलाकर लोगों में पहले की तरह चुनाव के प्रति उत्साह तो ही नहीं है। गांवों में तो फिर भी एक साथ कई का कफिला आता है तो लोग घर से निकल आते हैं, लेकिन शहरों में ऐसा नहीं लगता कि चुनाव चल रहे हैं। पोस्टर, बैनर की भी वैसा भरमार नहीं है जैसा पहले किया गया था। जनता की खामोशी या कहे हुए उत्साह न होने के दो ही कारण हो सकते हैं। या तो लोग पहले से बैठकर तय कर लेते हैं कि किससे वोट देना है या इस चुनाव में और इसके प्रचार से वे तंग आ गए हैं और गुस्से में भी हैं। कुछ पता नहीं चल रहा है। यही कारण है कि जो भाजपा पहले जीत के प्रति निश्चिन्त रहती थी, उसे भी गारंटी नहीं दी जा रही थी। कांग्रेस ने ऐसी सोच ही अपनाई है कि अब वह राज्यों के सत्ता के लिए दौड-धूप ही नहीं करता। सीधे 2024 के विधानसभा चुनाव में ही वह अपने करतब दिखाएंगे। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के राज्यों के चुनाव से अधिक मतलब नहीं रहा। उनका मकसद भी अगले 20 सितंबर को ही दिखाई दे रहा है।

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राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के बीच गुजरात प्रचार करने पहुंचे।  यात्रा का अगला मध्य मध्य प्रदेश है।

राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के बीच गुजरात प्रचार करने पहुंचे। यात्रा का अगला मध्य मध्य प्रदेश है।

राजनीति के जानकारों का कहना है कि कांग्रेस और सत्ता में बनी सभी पार्टियां अगली 10 दिसंबर को चुनाव में बीजेपी को पूरी तरह से हराने की बजाय 250 दायरे तक सीमित करने के मकसद से आगे बढ़ना चाहती हैं। क्योंकि जिस स्तर पर बीजेपी आज बैठी है वहां से उसे सौ-लदान सौ तक सीमित करना तो नामुमकिन है। हाँ, खुलापन सीमित होने से कई दूर होने की बात हो सकती है। किसी भी तरह से दूर के तरीके को साकार करने का लक्ष्य लेकर पहुंचना चाहता है। क्योंकि स्पष्ट दिख रहा है कि जिन राज्यों में सौ-सौवीं बीजेपी की सीटें हैं, वही गलत रिजल्ट हैं तो इस बार आने की संभावना कम है। दो-दो, तीन-तीन सीटें भी घटती हैं तो किसी निश्चित उद्देश्य के पूरा होने की अनुमान लगाया जाता है।

पीएम मोदी भी तीन दिन के दौरे पर पहुंचे थे गुजरात, यहां उन्होंने कई जनसभाएं कीं।

पीएम मोदी भी तीन दिन के दौरे पर पहुंचे थे गुजरात, यहां उन्होंने कई जनसभाएं कीं।

जहां तक ​​गुजरात का सवाल है, यहां हर बार से ज्यादा संघर्ष है। सभी समानता के लिए। चाहे वो भाजपा हो, कांग्रेस हो या आप पार्टी। पहले बीजेपी के प्रत्याशियों को साफ अंदाज हुआ करता था कि जीत का। इस बार ऐसा नहीं है। पूरा चुनाव इस बार बिहार की तरह के एथनिक मैट्रिक में उलझा हुआ है। गैर के बजाय इस बार ग्रामीण ही वोट फिक्सी और वे ही जीत-हार का फैसला भी घोषित करते हैं। इतना पक्का विचार जा रहा है कि आप और कांग्रेस पार्टी सरकार बनाने के समझौते का दम भी नहीं भर रहे हैं। कुल मिलाकर बंपर जीत की किसी को भी नहीं है। हालांकि जनता की खामोशी की असल वजह आठ दिसंबर को ही पता चली, जब चुनाव नतीजे सामने आएंगे।

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