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भारत के पहले निजी विक्रम-एस की लॉन्चिंग: श्रीहरीकोटा से सुबह 11:30 बजे भरेगा उड़ान, 300 लोगों के मिशन में तीन पेलोड के साथ ले जाएंगे

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सिकंदराबाद3 मिनट पहले

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भारत का पहला निजी विक्रम-एस आज श्रीहरीकोटा में सतीश अनुबंध अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च होगा। सिंगल स्टेज वाले इस मॉडल को इंडियन लॉजिकल स्काईरूट व्यू ने बनाया है। ये एक तरह का प्रदर्शन मिशन है जो तीन पेलोड को पृथ्वी से करीब 100 किमी की ऊंचाई तक ले जाएगा।

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कॉमर्शियल स्पेस एक्सप्लोरेशन को प्रमोट करने के लिए भारत की नोडल एजेंसी इन-स्पेस ने कहा, विक्रम-एस सबऑर्बिटल व्हीकल को लॉन्च किया गया। रॉकेट 11:30 बजे लॉन्च होगा। लॉन्च की कुल अवधि 300 सेकंड होगी। इस मिशन का नाम शुरू हो गया है।

तीन पेलोड को 81.5 किमी ऊपर स्थापित किया जाएगा
विक्रम-एस रॉकेट चेन्नई आधारित प्रायोगिक स्पेसकिड्ज, क्षेत्र आधारित एन-स्पेसटेक और अर्मेनियाई बाजूम-क्यू अंतरिक्ष प्रयोगशाला में तीन पेलोड ले जाएंगे। विक्रम-एस 81.5 किमी की ऊंचाई पर पेलोड इजेक्ट कर देगा। स्पेसकिड्ज़ का 2.5 किलोग्राम पेलोड ‘फन-सैट’ भारत, अमेरिका, सिंगापुर और इंडोनेशिया के छात्रों ने विकसित किया है।

अंतरिक्ष नियामक इन-स्पेस के अतिरिक्त पवन गोयनका ने कहा, ‘यह भारत में निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक बड़ी छलांग है। स्केच लॉन्च करने के लिए अधिकृत होने वाली पहली भारतीय कंपनी बनने के लिए स्काईरूट को बधाई।

6 मीटर लंबा और 550 किलो वजनी रॉकेट विक्रम एस
विक्रम एस केवल 6 मीटर लंबा सिंगल स्टेज स्पिन स्टेबलाइज्ड सॉलिड प्रोपेलेंट रॉकेट है। ये 422 न्यूटन का मैक्सिमम थ्रस्ट लैटर है। इसमें 4 स्पिन थ्रस्टर्स दिए गए हैं। इस मॉडल का वजन 550 किलो के करीब है। ये कलाम 80 रेकल्शन सिस्टम से पावर्ड है जिसका परीक्षण 15 मार्च 2022 को नागपुर की सोलर इंडस्ट्रीज में किया गया था।

स्काईरूट के बिजनेस लीड सिरीश पालीकोंडा ने कहा कि मिशन का उद्देश्य ग्राहक पेलोड के साथ विक्रम- मैं लॉन्च के लिए स्टेज तैयार कर रहा हूं। विक्रम-1 रॉकेट का पहला लॉन्च 2023 की दूसरी-तिमाही में लक्षित और अनुगामी के पास कस्टमर भी हैं।

स्काईरूट के विक्रम-एस रॉकेट में 4 स्पिन थ्रस्टर्स दिए गए हैं

स्काईरूट के विक्रम-एस रॉकेट में 4 स्पिन थ्रस्टर्स दिए गए हैं

विक्रम रॉकेट के 3 वेरिएंट डेवलप कर रहा स्काईरूट
स्काईरूट विक्रम रॉकेट के तीन भिन्न रूप विकसित कर रहे हैं। विक्रम-I पृथ्वी की कक्षा (लोइंक्लिनेशन ऑर्बिट) में 480 किलोग्राम पेलोड ले जा सकता है। ये सन सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट (SSPO) में भी 290 किग्रा पेलोड ले जा सकता है।

वहीं विक्रम-II 595 कार्गो को धरती की कक्षा में ले जाने में सक्षम है। ये 400 किग्रा पेलोड SSPO में ले जा सकता है। वहीं विक्रम क्लास-III 815 किलोग्राम पेलोड को धरती के जैसा और 560 किलो को SSPO में ले जा सकता है।

सैटेलाइट लॉन्चिंग कैब बुक करने में जितना आसान होगा
विक्रम का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापक डॉ. विक्रम साराभाई का नाम रखा गया है। ये खास तौर पर छोटे उपग्रह मार्केट के लिए तैयार किए गए मॉड्यूलर स्पेस लॉन्च व्हीकल्स की एक सीरीज है। आने वाले दशक में 20,000 से ज्यादा सैटेलाइट जारी किया गया है, और विक्रम सीरीज को इसी छोटे बाजार के लिए डिजाइन किया गया है।

स्काईरूट का दावा है कि सैटेलाइट को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करना जल्द ही कैब बुक करने का विवरण आसान हो जाएगा। ये पेलोड में सबसे कम कीमत वाला मॉडल होगा। कंपनी का यह भी दावा है कि विक्रम I को किसी भी साइट से 24 घंटे के भीतर रिफ्रेश और लॉन्च किया जा सकता है। वहीं विक्रम II और III को किसी भी लॉन्च साइट से 72 घंटे में रिक्रिएट और लॉन्च किया जा सकता है।

भारत में 100 से अधिक अंतरिक्षटेक प्रवासन
भारत में निजी आवंटन के लिए वर्ष 2020 में स्पेस सेक्टर को खोला गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा की थी। इसके लिए भारत सरकार ने सिंगल विंडो रिश्तेदार एजेंसी स्पेस प्रमोशन एंड ऑथोराइजेशन सेंटर IN-SPACe बनाया है। वैसे भारत में पहला प्रयास 2012 में युवा इंजीनियरों और छात्रों के एक समूह ने शुरू किया था, लेकिन 2020 के बाद से इसमें काफी तेजी आई है।

इकोनॉमिक सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार, 2021 में पर्यावरण विज्ञान सर्वेक्षण की संख्या 47 हो गई है। अभी ये संख्या 100 के पार पहुंच चुकी है। भारत में अभी कुछ पॉपुलर धूर्तता की बात करें तो ये स्काईरूट के अलावा बेलाग्राफिक्स, अग्निकुल, ध्रुव, एस्ट्रोगेट जैसे नाम शामिल हैं। एक अनुमान के मुताबिक इंडियन कॉमर्शियल स्पेसटेक मार्केट 2030 से 77 बिलियन डॉलर से ज्यादा का हो सकता है।

इस सेक्टर में फंडिंग 2021 में 198.67% बढ़कर 67.2 मिलियन डॉलर तक पहुंच गई थी, जो 2020 में 22.5 मिलियन डॉलर थी।

स्काईरूट की शुरुआत
इसरो में साइंटिस्ट रहे पवन कुमार चंदना को रॉकेट का चस्का उस समय लगा था जब वो आईआईटी खड़गपुर में थे। यहां तकनीकी इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे। IIT के बाद चंदना ने ISRO ज्वाइन किया। TEDx टॉक में चंदना स्टेट्स हैं, ‘कॉलेज के बाद मैं रॉकेट का दीवाना हो गया। ये शानदार मशीन पृथ्वी से बचकर अंतरिक्ष में जाने की ताकतवर हैं। उनके बिना हमारे पास इतनी सारी चीजें नहीं होतीं।’

चंदना ने इसरो में 6 साल किया काम। वोकैरायल के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में कार्यरत थे। वो कैसे कह रहे हैं, ‘मैं चित्र को समझने में बहुत खुश था कि ये काम करते हैं। इसरो में बनाया गया और लॉन्च करते हुए मोहित हो गया। यहां मैं जीएसएलवी-एमके-3 परियोजना का हिस्सा रहा हूं और लघु उपग्रह प्रक्षेपण के लिए परियोजना के उप प्रबंधक के रूप में काम किया है।’

इसरो में ही चंदना की मुलाकात एक अन्य आईआईटीयन नागा भरत डका से हुई। दोनों ने एक-दूसरे के सपने को समझा और नौकरी छोड़ दी। 2018 में दोनों ने एक साथ स्काईरूट कर्सर की शुरुआत की।

कक्षा के बारे में जानिए
पृथ्वी की कक्षा तीन प्रकार की होती है- उच्च अर्थ कक्षा, मध्यम अर्थ कक्षा और लो अर्थ कक्षा। कई वेदर और कुछ कम्यूनिकेशन उपग्रह उच्च अर्थ कक्षा में होते हैं, जो सतह से सबसे दूर होते हैं। माध्यम अर्थ ऑर्बिट में नेविगेशन और विशेष उपग्रह शामिल होते हैं, जिन्हें किसी विशेष क्षेत्र की निगरानी के लिए डिजाइन किया जाता है। नासा का अर्थ ऑब्जर्विंग सिस्टम फ्लीट सहित अधिकांश साइंटफिकसैट लो अर्थ ऑर्बिट में है।

705 किलोमीटर एल्टीट्यूड को सन सिंक्रोनस ऑर्बिट, 20200 किलोमीटर एल्टीट्यूड को जियोसिंक्रोनस (जीपीएस) और 35780 किलोमीटर एल्टीट्यूड को जियोस्टेशनरी ऑर्बिट कहा जाता है।

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