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मां बच्चों को दूसरे पति का सरनेम दे सकती है: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पिता की मौत के बाद महिला को बच्चों का सरनेम बदलने का हक

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नई दिल्ली3 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सरनेम को लेकर दिया गया आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट एक फैसला रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट के फैसले में महिला को निर्देश दिया गया था कि वह अपने नए पति का नाम रिकॉर्ड्स में बच्चे के सौतेले पिता के तौर पर दिखाए।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी मां बच्चे के बायोलॉजिकल पिता की मौत के बाद उसकी इकलौती लीगल और नैचुरल गार्जियन होती है। उसे अपने बच्चे का सरनेम तय करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि अगर वह दूसरी शादी करती है तो वह बच्चे को दूसरे पति का सरनेम भी दे सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मां अपने बच्चे को दूसरे पति को गोद लेने का अधिकार भी दे सकती है। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने पहले के फैसलों का भी जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मां को पिता के समान ही बच्चे का नैचुरल गार्जियन बताया था।

आंध्र की अकेला ललिता को मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट में यह केस आंध्र की अकेला ललिता ने दायर किया था। ललिता ने 2003 में कोंडा बालाजी से शादी की थी। मार्च 2006 में उनके बेटे के जन्म के तीन महीने बाद कोंडा की मौत हो गई। इसके बाद अकेला के सास-ससुर ने बच्चे का सरनेम बदलने पर विवाद खड़ा कर दिया।

ललिता ने पति की मौत के एक साल बाद भारतीय वायुसेना में विंग कमांडर अकेला रवि नरसिम्हा सरमा से शादी की। इस विवाह से पहले ही दंपती का एक बच्चा और था। ये सभी एक साथ रहते हैं। जब विवाद शुरू हुआ उस समय बच्चा अहलाद अचिंत्य महज ढाई महीने का था। अब उसकी उम्र 16 साल और 4 महीने है।

सास-ससुर ने पोते का सरनेम बदलने पर किया केस अहलाद के दादा-दादी ने 2008 में अभिभावक और वार्ड अधिनियम 1890 की धारा 10 के तहत पोते का संरक्षक बनाने की याचिका दायर की थी। इसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया था। इसके बाद दादा-दादी ने आंध्र हाईकोर्ट में याचिका लगाई कि बच्चे का सरनेम कोंडा से बदलकर अकेला कर दिया गया है। ललिता को गार्जियन मानते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें बच्चे का सरनेम कोंडा करने का निर्देश दिया।

मां को सरनेम बदलने से नहीं रोका जा सकता- SC
SC ने अब हाईकोर्ट के फैसले को गलत ठहराया है। कहा कि मां को नए परिवार में बच्चे को शामिल करने और उसका सरनेम बदलने से कानूनी रूप से रोका नहीं जा सकता है। सरनेम केवल वंश का संकेत नहीं है और इसे केवल इतिहास, संस्कृति के संदर्भ में नहीं समझा जाना चाहिए।

अलग सरनेम बच्चे की मेंटल हेल्थ के लिए सही नहीं
डॉक्यूमेंट्स में ललिता के दूसरे पति का नाम सौतेले पिता के रूप में शामिल करने के हाईकोर्ट के निर्देश को सुप्रीम कोर्ट ने इसे क्रूरता और नासमझी की श्रेणी में रखा। कहा कि यह बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को प्रभावित करेगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि एक सरनेम बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक बच्चा इससे अपनी पहचान हासिल करता है। उसके और परिवार के नाम में अंतर होने से गोद लेने का फैक्ट हमेशा उसकी याद में बना रहेगा, जो बच्चे को माता-पिता से जोड़े रखने के बीच कई सवाल पैदा करेगा। हम याचिकाकर्ता मां को अपने बच्चे को दूसरे पति का सरनेम देने में हमें कुछ भी गलत नहीं दिखता।

अहलाद को गोद ले चुका है दूसरा पति
ललिता की कोर्ट में याचिका के फैसले में समय लगने के बीच 12 जुलाई 2019 को उनके दूसरे पति ने एक रजिस्टर्ड एडॉप्शन डॉक्यूमेंट के जरिए बच्चे को गोद लिया था। कोर्ट ने कहा कि जब कोई बच्चा दत्तक लिया जाता है तो वह उस परिवार का सरनेम ही रखता है। ऐसे में कोर्ट का हस्तक्षेप करना सही नहीं है।

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