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मां-बाप के मरने की उम्मीद लेकर आते हैं सूरज: 10 संरचना की दो मंजिला बिल्डिंग; जहां मरने के लिए 20 रुपए में कमरा मिलता है

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प्रत्यक्षएक मिनट पहलेकॉपी लिंकअमेरिका के प्रत्यक्ष में रविवार सुबह...

2 मिनट पहलेलेखक: राजेश साहू और रक्षा सिंह

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वाराणसी का मणिकर्णिका घाट… इसके नसों जैसे बिच्छे शोर मचाते हुए सकारे रास्ते। यहां से 100 मीटर की दूरी पर काशी लाभ मुक्ति भवन है। इसकी पहचान घातक है। मतलब यहां के लोग अपने माता-पिता को इसलिए ला रहे हैं कि उनकी मौत हो जाए। मान्यता है कि यहां एक बार मृत्यु होने पर उसे जीवन-मरण का चक्र से फुरसत मिल जाता है।

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डेली भास्कर की टीम वाराणसी के लिबरधाम के अंदर पहुंची। मोक्ष की इच्छा लेकर आए लोगों से बात की। उनके परिजनों से बात की। जाना कि वो क्यों मरना चाहते हैं। वहां की व्यवस्था देख रहे लोगों से भी बात कर मुक्ति भवन की गाइडलाइन बनती हैं। आइए बारी-बारी से सब कुछ जानते हैं।…

10 कमरे, सभी में मौत का इंतजार है

यह मुक्ति भवन की तस्वीर है।  फाटक की आवाज लगभग एक ही शांति के अंदर है।

यह मुक्ति भवन की तस्वीर है। फाटक की आवाज लगभग एक ही शांति के अंदर है।

लकड़ी के हरे दरवाजे और सफेद दीवारों से बनी ये इमारत साल 1908 में बनी थी। उस वक्त इस भवन का प्रयोग मुक्ति के लिए नहीं होता था। 1958 में पहली बार इसे मुक्ति भवन का नाम दिया गया। तब से अब तक मोक्ष की चाह के लिए यहां 14 हजार 902 लोग आ चुके हैं। उनके रहने के लिए 10 कमरे हैं। भवन में एक मंदिर, पुजारी और सफाईकर्मी रहने के लिए चौथाई बने हुए हैं।

हम भवन के परिसर में पहुंचे तो चारों तरफ सन्नाटा और एक अजीब तरह की खामोशी थी। मातम वाली खामोशी। भवन के अंदर तो साउंड के जरिए ‘हरे रामा, हरे कृष्णा’ की धीमी आवाज में अटकी। कहते हैं ये धुन मन में शांति है इसलिए बजती रहती है। इसके बाद हम एक कमरे में पहुंचे। जहां लकड़ी के दो तख्त पड़े थे। यहां की सफेद प्रारूप तैयार हो चुकी है। छोटी सी खिड़की जहां से आ रही रोशनी में कमरे की धूल साफ नजर आ रही थी।

  • इस वक्ता मुक्ति भवन में दो मोक्षार्थी हैं, आइए पहले उनके बारे में जानते हैं।

मां यहां प्राण त्याग देंगे तो उन्हें मोक्ष मिलेगा

चंदौली की गुड़िया सिंह अपनी सासू मां को लेकर यहां आई हैं।  मां अब बिल्कुल के रूप में ही खाना खा रही हैं।

चंदौली की गुड़िया सिंह अपनी सासू मां को लेकर यहां आई हैं। मां अब बिल्कुल के रूप में ही खाना खा रही हैं।

चंदौली के जनक सिंह अपनी 90 साल की मां को लेकर मुक्ति भवन आए हैं। जनक के साथ उनकी पत्नी गुड़िया और भाभी कमला भी हैं। जनक दावेदार हैं, “हमें इस जगह के बारे में पहले से जानकारी थी। हमारे मामा की मृत्यु का दौर हुआ था। यहां जो व्यक्ति प्राण त्यागता है, उसे सद्गति मिलती है, उसे मोक्ष मिलता है। यही कारण है कि हम अपनी मां को लेकर यहां आए। हैं।”

गुड़िया सिंह बताती हैं, “हम लोग मुंबई में रहते हैं, सासू मां की तबीयत खराब की जानकारी मिली तो हम लोग घर आए। अब मां सिर्फ के रूप में खाना खा रही हैं, ऐसे में हम लोग इन्हें लेकर यहां आ गई दादी। सास की मृत्यु हुई थी तभी मां ने भी अपनी इच्छा जाते हुए कहा था कि अंतिम समय में मुझे यही लाना।

मुंह में खाना नहीं जा रहा इसलिए यहां लेकर चले गए

बिहार के रोहतास से श्रीपति अपने पिता को लेकर आए।  उन्हें उम्मीद है कि यहां पिता को मोक्ष की प्राप्ति होगी।

बिहार के रोहतास से श्रीपति अपने पिता को लेकर आए। उन्हें उम्मीद है कि यहां पिता को मोक्ष की प्राप्ति होगी।

बिहार के रोहतास जिले से श्रीपति यादव अपने 80 साल के पिता शिव पूजन यादव को लेकर मुक्ति भवन आए हैं। श्रीपति स्टेटमेंट्स हैं, “पिताजी का बचां हिस्सा लकवाग्रस्त। अब वह नहीं देख रहे हैं। हम उन्हें इलाज के लिए रोहतास और सासाराम लेकर गए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसलिए यहां मुक्ति लेकर भवन आए। क्योंकि यहां कोई प्राण त्यागता है तो उसे मोक्ष मिलता है।”

हम डालमिया समूह द्वारा संचालित इस मुक्ति भवन के प्रबंधक अनुराग शुक्ल से बात की।

कोई 5 स्टार होटल बनने के लिए तो कमरा नहीं लगेगा
यूपी, बिहार सहित देश के कई राज्यों में ‘काशी मरणान्मुक्ति’ की मान्यता है। काशी मरणान्मुक्ति का मतलब काशी में मृत्यु पर स्वर्ग मिलता है। मुक्ति भवन के प्रबंधक अनुराग शुक्ल चित्र हैं, प्रत्यक्ष ऐसा होता है, देश भर के लोग हमारे पास आते हैं। यह भवन हर धर्म-हर जाति के लोगों के लिए खुला है, बस वह काशी मरणान्मुक्ति पर गारंटी देता है।

अनुराग आगे कहते हैं, डालमिया समूह द्वारा संचालित इस मुक्ति भवन के कुछ नियम हैं। हम यहां पर एंट्री देते हैं जिसे डॉक्टर जवाब दे चुके हैं। या फिर वह वृद्ध हो गया है, उसकी चहलकदमी नहीं है। खुद से खाना नहीं खा रहे हैं। सभी लोग बुकिंग के लिए संपर्क करते हैं लेकिन हम उन्हें इन सीमित प्रविष्टियों पर देते हैं। सबसे पहले 15 दिन के लिए एंट्री देते हैं। हर दिन का मात्र 20 रुपए का चार्ज होता है, जो बिजली बिल के लिए मोक्षार्थियों से लिया जाता है। अगर मोक्षार्थी की मृत्यु नहीं होती तो हम इस समय को बढ़ा देते हैं।

हम चाहते हैं कि नींद में मोक्षार्थी परिवार के साथ रहें
अनुरागी कहते हैं, मोक्षार्थी के साथ परिवार के दो लोगों का रहना अनिवार्य है। दोनों लोगों को उसी कमरे में रहना होगा। ऐसा नियम इसलिए बनाया गया है ताकि व्यक्ति के साथ परिवार बना रहे। कोई बड़ी गलती की तो और सुधार करने की इच्छा हो तो वह अपने परिवार के लोगों से कहें। आखिरी वक्त में किसी व्यक्ति को परिवार ही हो जाता है।

परिवार को मोक्षार्थियों के लिए खाना बनाना होता है

गैस सिलेंडर-चूल्हा और नोट से मुक्ति भवन ही देता है।  ताकि परिजन यहां खाना बना सके।

गैस सिलेंडर-चूल्हा और नोट से मुक्ति भवन ही देता है। ताकि परिजन यहां खाना बना सके।

यहां आने वाले मोक्षार्थियों को गैस, सिलेंडर समेत सभी बर्तन दिए जाते हैं और उनके लिए खाना खुद बनाना होता है। मुक्ति भवन समिति का कहना है कि जब हम मोक्षार्थियों के लिए इतना कर रहे हैं तो खाना भी बनवा सकते हैं। लेकिन ऐसे में एक ही तरह का भोजन सभी मोक्षार्थियों को खाना होगा, जो हम नहीं चाहते।

इसलिए हमने नियम बनाया कि आखिरी बार उन्हें वही खाना दिया जाए जो उनकी खाने की इच्छा हो। इसके लिए परिवार के लोगों को सारा सामान दिया जाता है जिससे वो अपने मोक्षार्थी के पसंद का खाना बना सकते हैं।

बहुत से लोग आते हैं और मरते नहीं हैं, वे लौट जाते हैं
अनुरागी आगंतुक हैं कि कई बार मरीज यहां अंदर घुसता ही है कि उसे मोक्ष मिल जाता है। वहीं कई लोग ऐसे भी आ जाते हैं जो रातभर दर्द से कराहते रहते हैं, देखने पर पड़े रहते हैं पर उन्हें मौत नहीं आती। ऐसे में 15 दिन हो जाने पर हमें यहां से वापस लौटने के लिए आग्रह करना पड़ता है।

इस मुक्ति भवन में दो पुजारी, एक सफाई कर्मी हमेशा रहते हैं। तीन बार आरती होती है। प्रसाद के रूप में मोक्षार्थियों के मुंह में गंगाजल का कुछ धब्बा डाला जाता है।

यहां इतनी जुड़ी हुई लेकिन किसी को डर नहीं लगता

पुजारी सुबह 4 बजे उठ जाते हैं, इसके बाद इसके भवन में पूजा-आरती का क्रम चलता है।

पुजारी सुबह 4 बजे उठ जाते हैं, इसके बाद इसके भवन में पूजा-आरती का क्रम चलता है।

भवन में आरती-पूजन की जिम्मेदारी संभाल रहे कालीकांत दुबे कहते हैं, “सुबह 4 बजे ही यहां हम लोग उठ जाते हैं। मंदिर की साफ सफाई रोज होती है। 6:00 बजे से पूजा-पाठ शुरू हो जाता है। मंगल आरती होती है। इसके बाद हम ढोल लहराते हुए मोक्षार्थियों के पास जाते हैं और उनके मुंह में गंगाजल की धुंध घोलते हैं।

मोक्षार्थियों को दिन में तीन बार – सुबह 10 बजे, दोपहर 12 बजे और 3 बजे गंगाजल और तुलसी का पत्ता दिया जाता है। शाम को साढ़े पांच से साढ़े छह बजे तक रामायण होती है। साढ़े सात बजे तक भजन गाए जाते हैं। रात 8 बजे से 9 बजे तक एक आरती होती है। यहां के माहौल को इतना भक्तिमय बना रखा है कि इतनी मौत के बाद भी किसी को डर नहीं लगता।”

  • अंतिम में श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक आपके लिए।

यं हि न व्यथ्यन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोअमृतत्वाय कल्पते।।

इसका हिंदी अर्थ है, “जो मनुष्य सुख और दुख से नहीं होता है और दोनों स्थितियों में स्थिर रहता है, वह मोक्ष प्राप्ति के लिए निश्चित रूप से उचित है।”

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