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रेजांगला-डे पर विशेष: 60 साल पहले बूटों के अनुपात में चीनी सैनिकों पर टूट पड़े जांबाज; दुर्गम बर्फीली चोटी पर लिखा गया था अमर गाथा

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  • रेजांगला डे न्यूज: 60 साल पहले बहादुरों ने चीनी सैनिकों पर बूटों से किया था हमला; दुर्गम बर्फीली चोटी पर लिखी थी अमर गाथा

रेवाड़ी5 मिनट पहले

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रेजांगला युद्ध के समय 1962 में दीवाली के दिन चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करके सबसे शीर्ष चोटी पर शहादत की अमर गाथा लिखी गई थी।  - दैनिक भास्कर
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रेजांगला युद्ध के समय 1962 में दीवाली के दिन चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करके सबसे शीर्ष चोटी पर शहादत की अमर गाथा लिखी गई थी।

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आज से ठीक 60 साल पहले आज ही के दिन 18 नवंबर 1962 को मैसेज की दुर्गम हिमीली चोटी पर स्थित रेजांगला पोस्ट पर भारतीय सैनिकों ने रेजांगला की शौर्य गाथा लिखी थी। इस युद्ध में अहीरवाल के शूरवीरों ने ऐसी अमर कहानी लिखी, जो सदियों से युवाओं के जेहन में देशभक्त की भावना पैदा कर रही है।

खास बात यह है कि रेजांगला पोस्ट पर हुए इस भीषण युद्ध में हरियाणा के रेवाड़ी में रहने वाले दो सगे भाई एक ही दिन में एक बंकर में शहीद हो गए थे।

इस युद्ध में अहीरवाल के 114 रणबांकुरों 1300 चीनी सैनिकों के दांत खट्‌टे करते हुए वीरगति पाई थी। रेजांगला युद्ध की याद में रेवाड़ी शहर के दिल्ली रोड पर स्मारक भी बनाया गया है।

शहीद मेजर शैतान सिंह।

शहीद मेजर शैतान सिंह।

जब हम घरों में बैठे-बैठे वो जीते जा रहे थे
रेजांगला के शहीदों की याद में मशहूर लता मंगेशकर ने देशभक्त से ओतप्रोत गीत ‘ए मेरे वतन के लोग’ भी गाया था, जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लता मंगेशकर का ये गाना जब देश में थी दीवाली, वो खेल रहे थे होली, जब हम घरों में बैठे थे, वो जीते रहे थे गोली… रेजांगला के शहीदों को ही समर्पित है। इसकी हर एक पंक्ति रेवाड़ी और अहीरवाल क्षेत्र के उन रणबांकुरों की शौर्य गाथा कहती है, जिन्होंने 1962 में दीवाली के दिन चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करके सर्वोच्च शिखर पर शहादत की अमर गाथा लिखी थी।

लता मंगेशकर के इस गाने पर पंडित जवाहर लाल नेहरू भी पड़े थे।  उसके बाद वह लता मंगेशकर को अपने घर ले गए।

लता मंगेशकर के इस गाने पर पंडित जवाहर लाल नेहरू भी पड़े थे। उसके बाद वह लता मंगेशकर को अपने घर ले गए।

एक ही कंपनी के 114 जवान वीरगति प्राप्त कर रहे हैं
रेजांगला के इस युद्ध में एक ही कंपनी के 114 जवान वीरगति प्राप्त कर रहे हैं। ये सभी अरवाल क्षेत्र के ही थे। रेवाड़ी में आज भी रेजांगला शौर्य स्मारक पर इन वीरों के नाम सम्मान के साथ अंकित हैं। जहां हर साल रेजांगला डे पर उन्हें न केवल नाम दिया जाता है, बल्कि उनकी याद में कार्यक्रम भी होता है।

सिर्फ 124 जवान 1300 चीनी पर टूट पड़े
18 नवंबर 1962 को लेह-लद्दाख के दुर्गम और बर्फीले जीवों पर 13 कुमाऊं की चार्ली कंपनी के बड़े शैतान सिंह के नेतृत्व में 3 कमीशन अधिकारियों ने 124 सील्स सहित 1300 से अधिक चीनियों से लोहा लिया था। युद्ध में चार्ली कंपनी के 124 में से 114 जवान शहीद हो गए थे। इतिहास के झटके पर यह लड़ाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि मैदानी और रेगिस्तानी इलाके के वीरों ने बर्फ से ढके पहाड़ पर लड़ने के अभ्यस्त चीनियों से लोहा लिया।

रेजांगला में शहीद हुए जवान।

रेजांगला में शहीद हुए जवान।

… जब चीनी सैनिक हो गए नतमस्तक
रेजांगला के युद्ध में वीरों का पराक्रम और साहस देखकर चीनी सैनिक भी उस ज़बरदस्त भारतीय सैनिकों के सामने नतमस्तक हो गए थे। वे युद्ध स्थल पर एक प्लास्टिक की पट्टी पर ‘ब्रेव’ भरकर इन सैनिकों के शवों के पास सम्मानपूर्वक रखते हैं और वहीं सम्मान के प्रतीक के रूप में धरती पर संगीन गाड़ते हुए उस पर टोपी लटककर चले गए थे।

रेवाड़ी के दो सागे हो गए शहीद
रेजांगला का यह युद्ध इसलिए भी खास है, क्योंकि इसमें रेवाड़ी जिले के दो साधु भाइयों नायक सिंहराम और शिष्य कंवर सिंह यादव का भी जिक्र आता है, जो एक साथ ही बंकर में शहीद हुए हैं। 3 माह बाद उनके और 96 अन्य शवों को इसी क्षेत्र के जवान हरिसिंह ने जब मुखाग्नि दी तो उनका दिल दहल उठा लिया था। मुखाग्नि देकर वह भी वहीं गिर पड़ा।

रेवाड़ी में बना रेजांगला स्मारक
13 कुमाऊं के 120 युवा दक्षिण हरियाणा के अहीरवाल क्षेत्र अर्थात रेवाड़ी, गुरुग्राम, नारनौल और विशिष्ट गढ़ के क्षेत्र थे। रेवाड़ी शहर की धारूहेड़ा चुंगी स्थित दिल्ली रोड पर रेजांगला के वीरों की याद में स्मारक बनाया गया है, जिस पर इस युद्ध में शहादत देने वाले सील्स के नाम भी अंकित हैं।

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