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रेवड़ियों पर टिकी पार्टियाँ: चुनावों से गज़ब होते जा रहे हैं आम आदमी के झूठ और फ़्लैग मुद्दे

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7 मिनट पहले

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राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता अच्छी तरह जानते हैं लोगों को बरगलाना। वे झूठ को सच में बेच भी सकते हैं क्योंकि उनका प्रोफ़ेशन ही यही है। आम जनता ही नहीं खोज। पहले ग़रीबी, दस्तावेज़, बेरोज़गारी, किसानों की शिकायत के उचित मूल्य, ये सभी मुद्दे चुनावी चुनावों के दौरान भी माने जाते थे और इन मुद्दों पर सरकार ही बनती और गिरती भी थीं।

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याद ही होगा कि प्याज़ की क़ीमत पर एक बार कितना हुक हो गया था! लेकिन राजनीति के चतुर खिलाड़ियों ने इन असल मुद्दों को गलत कर दिया है। चुनाव मैदान से भी और लोगों के मन से भी।

चुनाव प्रचार, भाषण, यहां तक ​​कि रिश्ते-रिश्तेदार भी अब तो फेसबुक पर आ गए हैं।  समान संबंधों को तिलांजलि दिया गया है।  किसी को पता भी नहीं चला।

चुनाव प्रचार, भाषण, यहां तक ​​कि रिश्ते-रिश्तेदार भी अब तो फेसबुक पर आ गए हैं। समान संबंधों को तिलांजलि दिया गया है। किसी को पता भी नहीं चला।

भ्रष्टाचार तो चुनाव के पहले और बाद में अब कोई मेल ही नहीं रहा। क्यों? क्योंकि अब कोई विरोधी पार्टी सड़क पर उतरकर आंदोलन करना ही नहीं चाहती। छोटा-मोटा कुछ करते भी हैं तो खुले फोटो खिंचने और वीडियो वायरल करने के लिए। दरअसल, मैदानी लोग अब वाट्सएप और फ़ेसबुक या कहें सोश्यल मीडिया के गुलाम हो गए हैं।

यह गुलामी अभ्यारण्य, पत्रक, यहाँ तक कि आम जनता में भी अच्छी तरह रच- बस गई है। चुनाव प्रचार, भाषण, यहां तक ​​कि रिश्ते-रिश्तेदार भी अब तो फेसबुक पर आ गए हैं। समान संबंधों को तिलांजलि दिया गया है। किसी को पता भी नहीं चला।

चुनावों में अब मुद्दे नहीं, केवल जात-पात की बात होती है।  जातीय गणित ठीक है तो आर्थिक रूप से जीत जाता है, वर्ना हार जाता है।

चुनावों में अब मुद्दे नहीं, केवल जात-पात की बात होती है। जातीय गणित ठीक है तो आर्थिक रूप से जीत जाता है, वर्ना हार जाता है।

करोड़ आम जनता, वास्तविक वोटर, को ही वास्तविक मुद्दों की जांच नहीं हुई है तो पार्टियां तो कब से यही चाह रही थीं। पेट्रोल, डीज़ल की कीमत का समझौता – दाल का भाव अब किसी को पता नहीं है। ख़रीदा जाता है और प्रश्न पूछे बिना पैकेट पर लिखा हुआ क़ीमती ऑनलाइन स्वीकार किया जाता है। जब ट्रांसफ़र होता है तो यह ऑनलाइन पैसा बन जाता है, लोगों की लापरवाही का एहसास होना बंद हो जाता है। उन्हें पता ही नहीं है कि आख़िरी ख़याल या क़ीमत किस हद तक बढ़ गई है।

वे तो ठीक-ठाक ऑनलाइन काम करते हैं और बनते हैं। कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता! आप व्यावहारिक रूप से सहयोग करते हैं – आप दस किलो आटा लिए और ऑनलाइन आवेदन करिए, किलो का भाव न तो आपको पता है, न आप पूछना चाहते हैं। इसी तरह कार में पेट्रोल या डीज़लभरवाई। तीन या चार हजार रुपए पे कर दें। सर्टिफिकेट का भाव आप देखते ही नहीं हैं। यही कारण है कि चतुर-चालाक नेताओं ने वास्तविक मुद्दों को ग़ायब कर दिया है।

अब हर कोई जल्दी में रहता है।  काम करना चाहिए।  कैसे हुआ?  क्या-क्या करना पड़ा?  इस बारे में कोई डाकिया- विचारना ही नहीं चाहता।

अब हर कोई जल्दी में रहता है। काम करना चाहिए। कैसे हुआ? क्या-क्या करना पड़ा? इस बारे में कोई डाकिया- विचारना ही नहीं चाहता।

जब जनता को ही फ़र्क़ नहीं पड़ता है तो पक्का कैसे बनेगी? जब युवाओं को ही नौकरी का पता नहीं चलता है तो बेरोज़गारी फ़्लैमाइल कैसे बन सकता है? घूस तो ऐसी हर जगह इस तरह से घुल-मिल गया है जैसे किसी को कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। कारण तीतर है- अब हर कोई जल्दी में रहता है। काम करना चाहिए। कैसे हुआ? क्या-क्या करना पड़ा? इस बारे में कोई डाकिया- विचारना ही नहीं चाहता।

इसलिए चुनावों में अब मुद्दे नहीं, केवल जात-पात की बात होती है। जातीय गणित ठीक है तो आर्थिक रूप से जीत जाता है, वर्ना हार जाता है।

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