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शेर बहादुर देउबा और केपी शर्मा ओली के बीच मुकाबला, चुनाव पर भारत की भी आवाजें नेपाल चुनाव मतदान अद्यतन; शेर बहादुर देउबा बनाम केपी शर्मा ओली

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का5 मिनट पहले

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नेपाल में आज चुनाव हो रहे हैं। इसके लिए वोटिंग शुरू हो गई है जो शाम 5:00 बजे तक हो जाती है। यहां संसद और विधानसभा चुनाव के लिए एक साथ वोटिंग हो रही है। प्रतिस्पर्धी वर्तमान में प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के बीच है।

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नेपाल की संसद की कुल 275 क्षेत्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं की 550 विशिष्ट के लिए चुनाव हो रहा है। वर्ष 2015 में घोषित किए गए नए संविधान के बाद ये दूसरा चुनाव है। देश के 1 करोड़ 80 लाख से ज्यादा मतदाता अपनी सरकार को चुनेंगे। इसका रिजल्ट एक हफ्ते में आने की उम्मीद है।

नेपाल निर्वाचन आयोग के अनुसार, 22,000 से मतदान सर्वेक्षण पर मतदान हो रहा है।

नेपाल निर्वाचन आयोग के अनुसार, 22,000 से मतदान सर्वेक्षण पर मतदान हो रहा है।

भारत और चीन का सील
चुनाव पर भारत की आवाजें भी टिकी हैं। दरअसल नेपाल सिर्फ भारत का ही नहीं बल्कि चीन का भी पड़ोसी है। भारत को चौतरफा कॉर्डिनेशन के लिए चीन नेपाल की जमीन का इस्तेमाल करना चाहता है। भारत और नेपाल के संबंध भी अहम हैं। अब नेपाल की नई सरकार तय करेगी कि उसे किस देश-भारत या चीन के साथ रखा जाए।

नेपाल में हो रहे चुनावों में भारत भी मदद कर रहा है। यहां बिना किसी परेशानी के वोटिंग हो सकती है, इसके लिए भारत ने सुरक्षा की निश्चितताएं पूरी की हैं। नेपाल से खुला भारत और चीन की सीमाओं को सील कर दिया गया है। बिहार और उत्तर प्रदेश की लंबी सीमा नेपाल से शाखाएं है। यहां से दोनों देशों के लोग बिना वीजा और पासपोर्ट के आना-जाना कर सकते हैं।

3 लाख सुरक्षाकर्मी और एक लाख जनसेवक चुनावी दायित्व में बंधे हैं।  भारत ने चुनाव आयोग को अलग-अलग तरह के 80 नए वाहन दिए हैं।

3 लाख सुरक्षाकर्मी और एक लाख जनसेवक चुनावी दायित्व में बंधे हैं। भारत ने चुनाव आयोग को अलग-अलग तरह के 80 नए वाहन दिए हैं।

अमेरिका और चीन की आर्थिक मदद पर भी राजनीतिक विशेषाधिकार
नेपाल की राजनीतिक गैर-बराबरी में अमेरिका और चीन से आर्थिक मदद पर विदेशी स्थिति है। देउबा की पार्टी ने अमेरिकी मिलेनियम चैलेंज कोऑपरेशन के तहत 42 हजार करोड़ रुपये की मदद स्वीकार की है। इसे संसद से भी पास किया गया है। जबकि केपी शर्मा ओली की पार्टी चीन के साथ BRI के दावों पर ज्यादा उत्सुकता दिखाई देती है। छोटे पापी ने विदेशी मदद पर चुनाव प्रचार में अपना रूख साफ नहीं किया है।

ओली ने चुनावी अभियान में दस्तावेज भारतीय क्षेत्रों से जुड़े मुद्दे
केपी शर्मा ओली ने अपने रेलियों में भारत-नेपाल के बीच चल रहे कालापानी क्षेत्रीय विवाद को उठाया। 2019 में नेपाली प्रधान मंत्री ने भारत सरकार के नए नक्शे पर आपत्ति जताते हुए दावा किया कि नेपाल-भारत और तिब्बत के प्रयास जंकशन पर स्थित कालापानी अपने क्षेत्र में आता है।

ओली राष्ट्रवादी मुद्दों को घुमाते हुए वोटरों को अपने पक्ष में साधने में जुटे रहे।

ओली राष्ट्रवादी मुद्दों को घुमाते हुए वोटरों को अपने पक्ष में साधने में जुटे रहे।

ओली लाइव तो भारत-नेपाल सीमा विवाद हल करेगा
ओली का कहना है कि पीएम बने ही वो भारत के साथ सीमा विवाद हल करेंगे। वे देश की एक इंच भूमि भी नहीं जाने देंगे। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि 2 साल से ज्यादा सत्ता में रहने के बावजूद ओली ने इस विवाद को हल करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। आरक्षित मंत्री ओली ने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल में आवेदन करने के लिए नया आवेदन जारी किया था। भारत इन्हें उपने उत्तराखंड प्रांत का हिस्सा बनाता है। ओली ने इस अधिकार को नेपाली संसद में पास भी किया था।

पीएम देउबा भारत के साथ बातचीत से समझौते के पक्ष में
नेपाली कांग्रेस के शीर्षक और वर्तमान प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने कहा कि उत्तेजक और शब्दों की बजाय वो भारत के साथ संवाद और बातचीत के माध्यम से छोड़ें की कोशिश कर रहे हैं।

देउबा का ध्यान हमेशा नेपाल-भारत के संबंधों को मजबूत करता रहा है।

देउबा का ध्यान हमेशा नेपाल-भारत के संबंधों को मजबूत करता रहा है।

त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्रो. प्रेम खनल का कहना है कि चुनाव में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को एक बड़ी पार्टी की ओर से उठाया जाना ठीक नहीं है। पड़ोसी देश के साथ संबंध खराब होते हैं। साथ ही दुनिया भर में भी अच्छा संदेश नहीं जाता। चुनाव में इस तरह के अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को किसी भी पार्टी की ओर से नहीं उठाया जाना चाहिए।

नेपाल में राजनीतिक जोखिम
नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता है। यहां 1990 में लोकतंत्र स्थापित हुआ था और 2008 में राजशाही को खत्म कर दिया गया था। 2006 में गृहयुद्ध खत्म होने के बाद से कोई भी प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। नेतृत्व में बार-बार बदलाव और राजनीतिक दलों के बीच आपसी विवाद का चलन धीरे-धीरे हो रहा है।

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