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समंदर में बूब्स थे; खुद की जान भी खतरे में डालती है | श्रीलंका नाव बचाव; कौन हैं राजस्थानी कैप्टन अनिल चौधरी

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रायपुर22 मिनट पहलेलेखक: विक्रम सिंह सोलंकी

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7 दोपहर 3.10 बजे का समय। करीब 25 कार्गो शिप को एक अलर्ट मैसेज मिलता है…

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वंग ताऊ टाउन के दक्षिण-पूर्व में 258 समुद्री मील पर मछली पकड़ने की नाव फंसी हुई है, जिसमें 300 से अधिक लोग जुड़ गए हैं।

मैसेज पर कार्गों शिप हेलियोस लीडर ने सबसे पहले जवाब दिया। कैप्टन थे जयपुर के रहने वाले अनिल चौधरी जो जापान से सिंगापुर जा रहे थे।

लदान घंटे में वे एक साथ पहुंचें। खुद के जहाज में 30 लोगों को बचाने की क्षमता थी, फिर भी कैप्टन चौधरी उच्च जोखिम पर 303 श्रीलंकाई नागरिकों को बचाकर वियतनाम ले गए। कैप्टन अनिल को वियतनाम और सिंगापुर में रेस्क्यू के लिए सम्मानित किया गया।

लौटे हैं अनिल चौधरी रायपुर। वे रायपुर में रंगोली ग्रीन अपार्टमेंट में रहते हैं। डेली भास्कर टीम ने कैप्टन से जाना कि कैसे उन्होंने 303 श्रीलंकाई नागरिकों को बचाया। इस दौरान क्या कहने उनके सामने आए?

पढ़िए कैप्टन अनिल चौधरी की जुबानी…

बाद में आराम कर रहे थे, तब मिला संदेश

हम जापान से कार्गो शिप हेलियोस के दो प्रमुख नेताओं को सिंगापुर के लिए निकले थे। मेरे साथ 25 क्रू मेंबर्स की टीम थी। हमें 9 फैक्टर्स को सिंगापुरा था।’

‘7 चक्कर की दोपहर 3.10 बजे मैं लक्स के बाद आराम कर रहा था। तभी एक क्रू मेंबर आया और बोला- MRCC (मैरीटाइम रेस्क्यू कॉर्डिनेशन सेंटर) का अलर्ट मैसेज आया है। आस-पास एक योजना फंस गई है। इसमें 310 लोग हैं। बचाव करना है।’

‘ये पता चला कि मैं केबिन में गया और टीम से बात की। इसके बाद MRCC और NYK (जापान मेल शिपिंग लाइन) का मैसेज भेजा गया कि हम बचाव के लिए जा रहे हैं।’

लदान घंटे में नाव के पास पहुंचे

‘क्रू में मोटीवेट करने के बाद हम कार्गो शिप को लेकर निकले। बोट की योजना दक्षिण-पूर्व में 258 समुद्री मील थी। कार्गो जहाज की गति विस्तार और लदान घंटे में पहुंच गए। बोट में महिलाएं, बच्चों के साथ 303 लोग बूब्स थे। मौसम खराब था, तेज हवाएं चल रही थीं। अंधेरा गहरा रहा था। इतने लोगों को रेस्क्यू करना बड़ी चुनौती थी।’

नाव का इंजन खराब, पानी भरने लगा

‘ये एक फिशिंग बोट थी, जो काफी छोटी थी। नाव में ठूंस-ठूंस कर 303 श्रीलंकाई नागरिकों को बिठाया गया था। ये लोग श्रीलंका में आर्थिक स्थिति से परेशान होकर चोरी-छिपी कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जा रहे थे।’

‘बोट का इंजन खराब हो गया था। भराव पानी से धीरे-धीरे-धीरे डूब रहा था। वे 303 लोग दो दिन से बोट में चुभे हुए थे। नारंगी-प्यासे थे। कई लोगों की तबीयत खराब हो गई थी।’

जहाज में छेद हो सकता है

‘हम पास पहुंचे तो हवा के दबाव से नाव तेजी से घूम रही थी। बचाव के लिए नाव के पास जाना भी मुश्किल था। क्योंकि बोट की टक्कर से उनके कार्गो शिप में छेद भी हो सकता था। दो बार नाव के पास जाने की कोशिश की, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। दोनों ने जहाज के पैरेलल बड़े रास्से से नाव को बांधा और बचाव शुरू किया।’

लोग सबसे पहले जाड़ा करने लगे

‘जहाज पास पहुंचे तो डरे हुए लोगों में जिंदगी की उम्मीद जगी। वे पहले जाने के लिए जाड़ा करने लगे। आज्ञाकारिता करना। हमने उन्हें समना कि पहले छोटे बच्चों और महिलाओं को चढ़ाया जाएगा।’

‘बड़ी चुनौती थी कि एक भी बच्चा व महिला समुद्र में गिरती है तो बचाव रोककर पहले उन्हें निकालना होगा। दो क्रू मेंबर को पहले रोक दिया गया। एक-एक कर 24 महिलाएं व 20 बच्चों को ऊपर लेकर आईं। ये 10 बच्चे तो काफी छोटे थे, रेस्क्यू में काफी दिक्कत हुई।’

जहाज में 30 की क्षमता, 303 को बचा लिया गया

‘हमारे कार्गों शिप में जानकारी के तहत केवल 30 लोगों को रखने की क्षमता थी। क्रू मेंबर भी 30 लोगों के आने के लिए चपेट में आया। पहले हम 30 महिलाओं और बच्चों को लेकर आए। फिर क्रू मेंबर को मोटीवेट कर 100 लोगों को देखें। क्रू मेंबर मना करने लगे, लेकिन हमने जोखिम उठाया, क्योंकि उनके अलावा कोई रास्ता नहीं था। ऐसा नहीं हो सकता था कि हम 30 लोगों को जहर दें और बाकी को किस्मत के भरोसे छोड़ दें।’

3 कुक ने 303 लोगों का खाना बनाया

‘जहाज में आने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन 303 लोगों का इलाज करना और उनके लिए खाना बनाना था, क्योंकि वो 2 दिन से झुक गए थे। मेडिकल टीम ने सबसे पहले सभी का इलाज शुरू किया। जहाज में 3 ही रसोइया थे, न ही ज्यादा राशन था। ट्रो कुक ने जो भी जहाज में राशन था, उसी से खाना तैयार किया। इसके बाद एंकर की तरह बैठेकर सभी को खाना खिलाया।’

रेस्क्यू के 15 घंटे बाद वियतनाम पहुंचा

‘कार्गों शिप में चेन्नई के मुख्य इंजीनियर की दिनेश यादें भी थीं। इसके अलावा 19 फिलीपींस, 4 वियतनाम और 1 सिंगापुर का स्टाफ था। वे सभी काफी घबराए हुए थे। क्योंकि 303 लोगों को संभाल कर रखना काफी मुश्किल था। वे लोग उन पर हमला भी कर सकते थे। रेस्क्यू करने के बाद वे तेजी से जहाज को लेकर 15 घंटे बाद वियतनाम पहुंचे। क्योंकि सिंगापुर से उन्हें वियतनाम जाने के लिए भेजा गया था।’

वियतनाम पोर्ट पर श्रीलंकाई करें विरोध प्रदर्शन

‘हम 8 विज़िट की सुबह 10.30 बजे वियतनाम में मिसिंगाउ पोर्ट पर पहुंच गए थे। वहां पर दस्तावेज़, श्रीलंका एंबेसी से भी अधिकारी पहुंचे। अब उन लोगों को पोर्ट से आगे ले जाया गया। इसके लिए दो बड़े जहाज मंगवाए गए। इनमें से 150-150 लोगों को ले जाया गया था।’

‘श्रीलंका के लोग विरोध-प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने जाने से मना कर दिया। वे किसी की बात को सुनने के लिए तैयार नहीं थे। मैंने उन्हें समझाया कि उनके साथ कोई परेशानी नहीं होगी। दोपहर करीब दो बजे वे जाने के लिए तैयार हो रहे हैं।’

शाम को हम एक्स्ट्रा फर्ज व क्रू मेंबर्स के लिए खाना लेकर रवाना हो गए। पोर्ट अथोरिए और पोर्ट मास्टर ने पूरी टीम को बचाव मिशन के लिए सम्मानित किया। हम 11 को वापस सिंगापुर पहुंचे। वहां पर भी Nyk लाइन और अवलोकन की ओर से सम्मानित किया गया।’

पत्नी बोली : बचाव का संदेश मिला तो पूरी रात सो नहीं सकी

कैप्टन अनिल चौधरी की पत्नी राजेश्वरी ने बताया कि उनके पास दोपहर में मैसेज आया कि रेस्क्यू मिशन पर जा रहे हैं। इसके बाद मोबाइल पर कोई संपर्क नहीं हो सका। वे देर रात तक बार-बार कॉल करते रहे, लेकिन कनेक्ट नहीं हुआ।

राजेश्वरी ने बताया कि पूरी रात सो नहीं सका। मन में सवाल बढ़ते जा रहे हैं पता नहीं क्या हो रहा है। सुबह होते ही चीजों को जानने के लिए सीधे उनके विभाग में मेल कर दिया। वहां से मैसेज आया कि रेस्क्यू चल रहा है, लेकिन सब कुछ ठीक है। तब सुक मिला। एक दिन बाद पति अनिल चौधरी से बात हो सकती है। बचाव की बात सुनकर वे भी कांप उठते हैं।

पिता सेना में थे, परिवार से ही मिली प्रेरणा

कैप्टन अनिल चौधरी के बयान हैं कि उनका जन्म नागौर के परबतसर में हुआ था। वह लंबे समय से रायपुर के रंगोली ग्रीन अपार्टमेंट में परिवार के साथ रहते हैं। उनके पिता सूरजमल चौधरी भी आर्मी में थे। बड़े पद से हानिकारक थे।

सेना के कई बड़े ऑपरेशन में पिता शामिल रहे। वे हिमाचल प्रदेश में आर्मी स्कूल में पढ़े थे। वर्ष 1994 में वे मर्चेंट नेवी में शामिल हुए। इसके बाद 2004 में वे अनवाई की लाइन में शामिल हो गए। 2010 में चौधरी को प्रमोट कर कैप्टन बनाया गया। वे कार्गो ऑपरेशन करते हैं। उनके भाई राजेश चौधरी बिजनेसमैन हैं।

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