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साइकिल, कुश्ती और चरखा स्टेक्स से जुड़े ‘नेताजी’: 5 भैंसाओं पर था नेताओं की बारात; गांव वालों ने अनाज बेचाकर जीता था पहला चुनाव

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5 मिनट पहलेलेखक: रक्षा सिंह

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आज ही के दिन 1939 में इटावा के सैफई गांव में आक्रोश सिंह यादव का जन्म हुआ था। पिछले महीने 10 अक्टूबर को उनका निधन हो गया था। सब्सक्राइब सिंह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानियां हैं। कहानियों में उनकी जिम्मेवारी और राजनीति के दांव-पेंच हैं, सच्चाई का इस्तेमाल करके सिंह ने दृष्टी और दशा बदल दी है।

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इस क्षणों पर उनकी जिंदगी के ऐसे ही किस्से। आइए एक-एक करके नेताजी की जिंदगी के लिए पलटते हैं।

पंडित ने कहा था- ये लड़का पढ़ेगा और कुल का नाम रोशन करेगा
22 नवंबर को किसान सुघर सिंह के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम रखा गया। वो परिवार में तीसरे नंबर के बेटे थे। उनके जन्म होने पर गांव के पंडित ने कहा था कि ये बच्चा पढ़ेगा और उसका कुल का नाम रोशन होगा। पंडित की बात सुनकर पिता ने उन्हें पढ़ाई के ठान ली।

करहल के जैन इंटर कॉलेज से दाखिले ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की।

करहल के जैन इंटर कॉलेज से दाखिले ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की।

तीसरी कक्षा में मिला था
वर्णमाला को भी पढ़ना पसंद था। वो स्कूल जाने लगे। एक दिन जब स्कूल गए तो मास्टर सुजान ठाकुर बच्चों से सवाल-जवाब कर रहे थे। उन्होंने सभी बच्चों के साथ घबराहट की भी परीक्षा ली। जिन भी बच्चों ने सही जवाब दिया, मास्टर जी ने उन्हें तीसरी कक्षा में ही नोट दिलवा दिया। उन बच्चों में भी शामिल थे।

पढ़ाई के साथ शरीर का भी ध्यान रखते थे
स्लिमर को बचपन से ही दुबक गई थी। उनके पिता भी चाहते थे कि सभी बच्चे पढ़ाई करें साथ ही अपने शरीर का भी ध्यान रखें। इसलिए लगातार पहलवानी की प्रैक्टिस करते रहे साथ ही कई प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लिया। धीरे-धीरे वो अपनी उम्र के पहलवानों के बीच चैंपियन बन गए।

सुनीता एरॉन ने अपनी किताब

सुनीता एरॉन ने अपनी किताब “विंड्स ऑफ चेंज” में घबराहट के कुश्ती में प्रसिद्ध चरखा स्टेक्स का जिक्र किया है।

पत्रकार सुनीता एरॉन ने ऑलेश यादव की बायोग्राफी, “विंड्स ऑफ चेंज” में आपस के चचेरे भाई राम गोपाल यादव के देख-रेख में चरखा स्टेक्स का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि कद में नेताजी छोटे थे, लेकिन कुश्ती में उनके चरखा स्टेक्स ने कई पहलवानों को चित्रित किया। बड़े-बड़े सितारों की इस स्टेक्स से जुड़ी थीं।

18 साल की उम्र में ही उसके पिता ने नौकरी कर ली
साल 1957. 10वीं की पढ़ाई कर रहे थे। उनके पिता ने 18 साल की उम्र में ही उनकी शादी तय कर दी थी। इतनी कम उम्र में शादी नहीं करना चाहते थे। उन्होंने इसका विरोध भी किया, लेकिन परिवार ने अपनी एक ना सुनी। सैफई से करीब 20 किलोमीटर दूर रायपुरा गांव में उनकी शादी तय हुई थी।

5 भैंसों को बार-बार घेरा गया था
शादी का दिन आ गया। उस वक्त झपकी की स्थिति ठीक थी, ना आने-जाने के लिए पर्याप्त क्षमता वाली थी। इसीलिए 5 बैलगाड़ियों की बारात पर ले जाया गया। तीन घंटे की यात्रा के बाद जब बाराट गांव आता है, तो सभी बाराती धूल से लिपट जाते हैं और सूरज के पर्दे टूट जाते हैं। सभी बारातियों का स्वागत हुआ और नौकरी की मालती देवी से शादी कर ली।

  • शादी के बाद भी जिम्मेवारियों ने नहीं छोड़ा। वो एक बड़े पहलवान बनना चाहते थे, इसलिए लगातार प्रतियोगिताओं में भाग लेते गए।

कुश्ती ने राजनीति में प्रवेश प्रविष्टि
वर्ष 1965 में तंग इटावा में एक कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लिया। इस प्रतियोगिता में वोटंट जसनगर के उस वक्त के विधायक नत्थू सिंह यादव मुख्य अतिथि थे। कुश्ती शुरू हुई। मैंने अपना वजन दो गुना वजन के लिए जिम्मेदार होने पर फिट कर दिया। इससे नत्थू यादव बहुत प्रभावित हुए और व्यस्तता को राजनीति में आने का फैसला लिया।

साल 1967 में चुनावी लड़ाई के लिए नत्थू ने अपनी जसवंतनगर की सीट तक छोड़ दी। अपने राजनीतिक गुरु को निराश नहीं किया। वो पूरी ताकत से चुनाव की तैयारी करने में लग गए।

डॉ.  संजय लाठर ने अपनी किताब 'समाजवाद का सारथी, अखिलेश यादव का जीवनगाथा' में लिखा है कि व्यस्त साइकिल पर घूमकर चुनाव प्रचार करते और वोट मांगते थे।

डॉ. संजय लाठर ने अपनी किताब ‘समाजवाद का सारथी, अखिलेश यादव का जीवनगाथा’ में लिखा है कि व्यस्त साइकिल पर घूमकर चुनाव प्रचार करते और वोट मांगते थे।

नामांकन के पास चुनाव प्रचार के लिए बस एक साइकिल थी। 1960 के दशक में देश में समाजवाद की लहर थी। यूपी में आए दिन राम मनोहर लोहिया समेत दिग्गज समाजवादियों की रैलियां होती थीं। अनुयायियों को अब समाजवादी विचारधारा रमने लगी है। अब वो अखाड़े के साथ-साथ रेलियों में भी जाने लगे। उन्हें विधायक का टिकट भी मिल गया। लेकिन उनके पास प्रचार के लिए कोई पैसा नहीं था। सिर्फ एक सैरकिल थी। जो बाद में उनका चुनाव चिन्ह बन गया।

…जब दिया ‘एक वोट, एक नोट’ का नारा
डॉ. संजय लाठर ने अपनी किताब ‘समाजवाद का सारथी, अखिलेश यादव की जीवनगाथा’ में लिखा है, “इस रोजगार के समय में मैंने याचिका के दोस्त दर्शन सिंह ने उनका साथ दिया। वो साइकिल चलाने और नौकरी पर शामिल होने के लिए एक गांव से दूसरे गांव जाते हैं और वोट मांगते हैं। लेकिन बहुत देर तक ऐसा काम नहीं चल रहा था। चुनाव का अच्छा से प्रचार करने के लिए पैसों की जरूरत होने लगी। ऐसे में दोनों ने मिलकर ‘एक वोट, एक नोट’ का नारा दिया। वो गाँवों से चंदे में एक पहली मांगते और उसे लक्ष्य सहित लौटाने का वादा करते हैं। ऐसे ही पैसे इक्ठठा करके वे एक ओल्ड एंडबेसर कार उठाएं।”

प्रचार के लिए कार आई, तो तेल के लिए पैसे नहीं
अब चुनाव प्रचार के लिए गाड़ी तो गई थी लेकिन उसमें तेल डालने के पैसे नहीं बचे थे। इसी बात को लेकर एनकाउंटर के घर पर मीटिंग चल रही थी। इतने गांव के निवासी सोने के रंग का उठे और बोलते हैं, “हमारे गांव से कोई पहली बार विधायक का चुनाव लड़ रहा है, हम उसके लिए पैसे की कमी नहीं होने देंगे।”

गांव वालों ने व्रत रखा, बचे अनाज को बेचकर गाड़ी में तेल डालवाया
गांव में जब इस बात की चर्चा हुई तो लोगों को कुछ समझ नहीं आया। क्योंकि उनके पास भी खेती-किसानी और सहयोगियों के अलावा कुछ नहीं था। इसलिए गांव के लोगों ने फैसला किया कि वो हफ्ते में एक दिन सिर्फ एक वक्त खाना खाएंगे। उससे ज्यादा अनाज उसे बेचकर एंबेसडर कार में तेल भर देंगे। इसी तरह तेल के लिए पैसों का अख्तियार कर प्रचार जोर से होने लगा।

चुनाव आया। संकोच की लड़ाई कांग्रेस के दिग्गज नेता हेमवंती नंदन बहुगुणा के शिष्य एडवोकेट लाखन सिंह से थी। मतदाता के जीतने की उम्मीद कम थी। लेकिन जब नतीजे आए तो सब चौंक गए। सियासत के अखाड़े की पहली लड़ाई जीत गए थे। सिर्फ 27 साल की उम्र में आक्रोश के उस वक्त के सबसे कम उम्र के विधायक बने और इसी से लिप्त सिंह ‘नेताजी’ बन गए।

ये तो थी नेताजी के पहले चुनाव की कहानी। अब बात उस किस्से की जहां उन्हें मारने के लिए लगातार 9 गोलियां दागी गईं। लेकिन उससे पहले कवर सिंह के राजनीतिक जर्नी से यह ग्राफिक दृश्य दृश्य।

जब अखबारों में छपे नेताओं की जान से मारने की खबर
8 मार्च 1984 की सुबह। जनसत्ता अखबार में नेताजी पर छपी एक खबर को हर कोई चौंक गया। खबर क्या थी, ये जानने के पीछे वजह हैं…

तारीख- 4 मार्च 1984, दिन- रविवार। नेताजी की इटावा और मैनपुरी में रैली हुई थी। रैली के बाद वो मैनपुरी में अपने एक दोस्त से मिलने गए। दोस्त से मिलने के बाद वो 1 किलोमीटर ही चले थे कि उनकी गाड़ी पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू हो गई। मारने वाले छोटे लाल और आंखों में गोली मारने वाले नेताजी की गाड़ी के सामने कूद गए। छोटेलाल नेताजी के साथ ही चलते थे, इसलिए उन्हें पता चला कि वह गाड़ी में किधर बैठे हैं।

तस्वीर 8 मार्च 1984 के जनसत्ता अखबार की है।  अखबार में नेताओं पर जानलेवा हमले की खबर छपी थी।

तस्वीर 8 मार्च 1984 के जनसत्ता अखबार की है। अखबार में नेताओं पर जानलेवा हमले की खबर छपी थी।

कदाचित छोटा था, इसलिए गोली उन्हें नहीं लगी
करीब आधे घंटे तक छोटेलाल, आंखों और पुलिस के दावों के बीच चलती रही। छोटेलाल नेताजी के साथ ही चलता था। इसलिए उसे पता चला कि वह गाड़ी में बच्चे बैठे हैं। यही कारण है कि उन दोनों ने 9 पिल्स कार के उस हिस्से पर डिक्रिप्शन किया, जहां नेताजी सत्य करते थे। लेकिन लगातार चलते-चलते ड्राइवर का ध्यान हट गया और उनकी गाड़ी डिसबैलेंस से भरी नाले में गिर गई। नेताजी ने तुरंत समझ लिया कि उनकी हत्या की साजिश रची गई है। उन्होंने तुरंत सभी की जान बचाने के लिए एक योजना बनाई।

घबराहट ने सबसे ‘नेताजी मर गए’ चिल्लाने को कहा
उन्होंने अपने बंधुओं से कहा कि वो जोर-जोर से चिल्लाएंगे कि ‘नेताजी मर गए। उन्हें गोली लग गई। नेताजी नहीं रहे।’ जब सन्दूक ने चिल्लाना शुरू किया, तो हमलावरों को लगा कि नेताजी सच में मर गए। उन्हें मरा हुआ समझकर हमलावरों ने गोलियां पी लीं और वहां से पहुंच गए। लेकिन पुलिस की गोली लगने से छोटेलाल की उसी जगह मौत हो गई और आंखें बुरी तरह जख्मी हो गईं।

इसके बाद सुरक्षाकर्मी नेताजी को एक जीपी में 5 किलोमीटर दूर कुर्रा पुलिस स्टेशन तक ले गए। ये बात जब चौधरी चरण सिंह को पता चले तो वो नेताजी को लेकर बहुत चिंता करने लगे। उन्होंने नेताजी को सुरक्षा की रसीदें देने के लिए यूपी स्टेट काउंसिल में सभी का नेता बनवा दिया। इस वाकये के बाद साल 2012 तक देश की राजनीति ने जिस तरफ भी करवट ली, हम वहीं रुक गए, रुक गए।

चौधरी चरण सिंह को हमलों की खबर निकली तो उन्होंने रोजगारों को सुरक्षा खातों के लिए यूपी बोर्ड में अंपायर का नेता बना दिया।

चौधरी चरण सिंह को हमलों की खबर निकली तो उन्होंने रोजगारों को सुरक्षा खातों के लिए यूपी बोर्ड में अंपायर का नेता बना दिया।

  • …लेकिन 2012 के बाद अपना राजनीतिक सियासत का आदेश बेटे अखिलेश यादव को सौंप दिया।

मैं पूरे पूरे सीएम को बनाऊंगा, यह शिवपाल को भी नहीं पता था
वर्ष 2012. यूपी विधानसभा चुनाव का रिजल्ट आया। सपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत से जीत हासिल की। 223 बयान से जीत के बाद सरकार बनी। सभी स्याही सिंह यादव के सीएम पद की शपथ लेने का इंतजार कर रहे थे। अखिलेश को भी पार्टी में अहम जगह मिलने की उम्मीद थी। लेकिन उन्हें सीएम ने कहा, इस बात की भनक शिवपाल यादव सहित किसी व्यक्ति को नहीं था।

ज्योतिष से कहा- अखिलेश के नाम से देखें शपथ ग्रहण का मुहूर्त

2012 में चुनाव जीतने के बाद अचानक से ही आक्रोश ने अखिलेश यादव को पार्टी की कमान सौंपी और उन्हें यूपी का मुख्यमंत्री बना दिया।

2012 में चुनाव जीतने के बाद अचानक से ही आक्रोश ने अखिलेश यादव को पार्टी की कमान सौंपी और उन्हें यूपी का मुख्यमंत्री बना दिया।

सब्सक्राइब सिंह ने शपथ की तारीख एक ज्योतिष से निकलवाने का फैसला किया। ज्योतिष ने कनेक्शन से मुलाकात कर उनके नाम से शपथ ग्रहण की तारीख निकाली। उसी दौरान धीरे-धीरे ज्योतिष को कहा जाने लगा, “अखिलेश के नाम की तारीख निकालो।” यही वो मौका था जब ओपनिंग पता चला कि अपने सभी बेटों को यूपी का सीएम बनाना चाहते हैं।

हालांकि किसी ने भी समावेश के इस जजमेंट का विरोध नहीं किया और अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया गया। इस तरह राजनीति में अपनी हंक रहते हुए ही व्यस्त रहते हुए अपनी सियासी विरासत सभी को सौंप दी।

मतदाता ने सीएम अखिलेश को बनवा दिया लेकिन राजनीति में उनका पैट अब भी शामिल था। वो पहले की तरह ही एक्टिव रहते थे। उनके हर पार्टी के नेताओं के साथ उठना-बठना था।

पासपोर्ट ने पीएम मोदी की जीत की कामना की थी

साल 2019 में चुनावी जाम में व्यस्त सिंह यादव ने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की इच्छा छोड़ दी थी।

साल 2019 में चुनावी जाम में व्यस्त सिंह यादव ने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की इच्छा छोड़ दी थी।

साल 2019. 16वीं लोकसभा का आखिरी दिन था। मतदाता ने भाषण शुरू किया। पहले तो उन्होंने सभी सदस्यों को अधिशासित किया। उसके बाद नरेंद्र मोदी की तरफ देखते हुए कहा कि हम लोग तो इतना बहुमत नहीं ला सकते हैं इसलिए मैं चाहता हूं कि आप फिर से प्रधानमंत्री बनें। इसके बाद पीएम मोदी ने हाथ जोड़कर शपथ ली।

मोदी ही नहीं, जाम ने अन्य पार्टियों और नेताओं से जो स्थायी रूप से स्थायी हुए। लेकिन ये चिकन 10 अक्टूबर 2022 को खत्म हो जाएगा। हमारे बीच नहीं रहे। आज 42 दिन बाद उनकी पहली जयंती है।

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