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स्वच्छ, फेयर इलेक्शन: सुप्रीम कोर्ट में बहस, टीएन शेष मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में क्यों?

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2 मिनट पहले

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एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है। तर्क ये है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर विकलांग टीएन शेष के रूप में कोई व्यक्ति नियुक्त हो सकता है। इसकी सबसे बड़ी संभावना चुनाव आयोग में नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र कॉलेजियम बनाने की है।

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फ़िलहाल ये नियुक्तियाँ कैबिनेट की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं। कह सकते हैं कि अब तक चुनाव आयोग में सरकार ही अपनी मर्जी के लोगों का चयन कर रही है। हर कोई जानता है कि 1990 से 1996 तक जब टीएन शेष चुनाव आयोग के प्रमुख रहे, तब तक ज्यादा लोगों को पता चला कि चुनाव आयोग के नाम की कोई भी संस्था होती है जो न सरकार से डरती है, न किसी और का दबाव उस पर कोई काम कर पाते हैं।

इसके पहले और बाद में राजनीतिक और जातिवादी शेष जैसे किसी व्यक्ति से तौबा ही कर ली। एक शेष ही वे लोग थे जो समानताएं, और उनके प्रत्याशियों पर अच्छी तरह नकली डाली गई थी। प्रत्याशियों की हालत तो ये कर दी गई कि चुनाव आयोग का नाम सुनकर ही काँपने लगे। चुनाव खर्च हो, जातीय या धार्मिक उल्लेख वाले भाषण और ऐसी तमाम बातों पर रोक लगा दी गई थी जो चुनाव को किसी भी तरह की उग्रता की तरफ ले जाती हैं या इससे स्वच्छ, उत्सव और चुनाव किसी भी रूप में प्रभावित होता है।

शेषन के पहले और बाद में तो चुनाव का समय, वोटिंग की तारीखें और कई चीजें पाने के लिए शर्त से निर्धारित होने लगीं और ऐसा करके चुनाव आयोग को बड़ा गर्व की भावना महसूस हुई। यही सब मनमर्जी बंद करने के लिए बाकी जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त की खास भावना की जा रही है। हालाँकि केंद्र सरकार फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में स्पष्ट जवाब नहीं दे पा रही है।

अटार्नी जनरल का कहना है कि सरकार को संघ चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन स्वतंत्र कॉलेजियम करने या बनाने के बारे में उनका जवाब गोल-मोल है। निश्चित है- कोई सरकार नहीं चाहती कि चुनाव आयोग में उसका परोक्ष हस्तक्षेप भी बंद कर दिया जाए। अत्यधिक प्रभुत्व का प्रश्न है और चुनाव पर ही सभी सत्ताएं टिकी होती हैं।

शेषन जैसे व्यक्ति को नियुक्त करके कोई राजनीतिक पार्टी या कोई सरकार क्यों आफ़त मोल लेना अच्छा लगेगा! ख़ैर, माथापच्ची जारी है। अगर कॉलेजियम बनता है तो उम्मीद की जा सकती है कि शेयरधारकों के नए आयाम में प्रवेश करने में चुनाव आयोग बहुत हद तक स्थायी हो सकता है।

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