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3 किमी सिर पर पानी ढोते-ढोते पैर सूज हो जाते हैं: यूपी के सूखे ग्रस्त इलाकों में सड़कों पर महिलाएं छोड़ती हैं; 40 साल बाद भी कुंवारे हैं मरद

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6 मिनट पहलेलेखक: देवां तिवारी

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विमल, बढ़ई और चिरई बुंदेलखंडों के उन गांवों में रहते हैं, जहां खुदाई से भी पानी नहीं बहता है। वैसे भी बुंदेलखंड में पानी की कमी एक ऐसी ही खबर की तरह है, जो सालभर अखबारों की अधिसूचना में बनी रहती है। लेकिन ये सच्चाई अब पुरुषों के लिए श्राप बन गई है। कुछ 40 की उम्र के बाद भी कुंवारे हैं। दूसरे वो हैं जिनकी शादी के बाद पत्नियां छोड़कर चले गए।

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हम पानी की मौत से जूझ रहे चित्रकूट के 10 शहरों में पहुंचे। इन चौराहों में ‘जल जीवन मिशन’ की आप जाननी चाहते हैं, तो कुछ दुखभरी कहानियां आपकी आंखों के सामने आ गईं। जरा इन कहानियों से रूबरू होते हैं, फाइल दस्तावेजों के माध्यम से बंधी बुंदेलखंड की सच्चाई जानेंगे।

3 गांव 3 कहानियां…

पहला गांव: गोपीपुर में पानी की वजह से 50% युवा कुंवारे
मानिकपुर के गोपीपुर गांव में 5000 लोगों की आबादी है। यहां रहने वाले 250 परिवार पीने के पानी के लिए सिर्फ 1 कुएं पर टिके हैं। ये कुआं गांव से 2 किलोमीटर दूर है। वहां से साइकिल पर, बैलगाड़ी से और कंधों पर लादकर लोग पानी लाते हैं। गांव की महिलाओं का पूरे दिन पानी भरने का आंकलन ही किया जाता है। पानी के लिए इस जद्दोजहद के कारण गांव के 50% युवा कुंवारे हैं।

गोपीपुर के रहने वाले विमल यादव 4 भाइयों में इकलौते हैं, इस दिन शादी नहीं हुई है। तीनों भाई काम की तलाश में निकले और उनके ब्याह भी हो गए। विमल गोपीपुर में ही रह गए और किसान करने लगे। 35 साल बाद भी आज विमल कुंवारे हैं।

विमल कहते हैं, “हमारे लिए तीन-चार रिश्ते आए, लेकिन जब लड़की वालों ने पानी की समस्या को देखा तो शादी रद्द कर दी। कहने लगे कि बिटिया दिनभर पानी ही भरती है तो शादी करने से क्या फायदा। अब हमने शादी की उम्मीद ही छोड़ दी है।”

पानी की वजह से आपकी 3 बार की शादी टूट जाती है, क्या लोग इस बात पर हंसते हैं? हमारे सवाल पर छोड़े हुए जवाब दिया- हम फालतू बातों पर ध्यान नहीं देते।

दूसरा गांव : करौंहा में 11 सरकारी हैंडपंप 10 खराब

करौंहा गांव के चित्रलेखों में सबसे कम लेटेरेजी में से एक है। यहां 2017 से 11 सरकारी इंडिया मार्का नल लगवाए गए। लेकिन केवल 1 ही चालू हालत में हैं। गांव के बाहर पुराना कुंआ है। बारिश के दौरान इसमें पानी भर जाता है। ग्रामीण अब पेज से बचने के लिए इसी के भरोसे हैं। यहां की आबादी 7500 है।

करौंहा पंचायत के निवासी बढ़ गए के दोनों छोटे भाई काम करने लगे, तो उनकी शादी हो गई। लेकिन वो 48 साल बाद भी कुंवारे हैं। घर में 2 बहु हैं, इसलिए अब वो चौखट पर बनी हुई कम क्षमता में रहते हैं।

बढ़ते हुए कहते हैं, “साहब एक तो हम गरीब हैं, ऊपर से पानी की समस्या। पांच बार लड़की आई, लेकिन घर की औरतों को बाहर से पानी ढोता देख रिश्ता तोड़ दिया। कहने लगे कि हम अपनी लड़की नहीं रखेंगे। टाइस से शादी हो गई तो हमारे में 2-3 बच्चे होते हैं।”

माइक देखकर बढ़का फिर हंसते हुए कहते हैं, “अब उम्र हो गई है साहब। औरत मिले अय न मिले। हमें कॉलोनी दिलवा दें। कम से कम चैन से सो तो विल।”

तीसरा गांव: चितघटी में 1 कुआं 10 साल से लोगों के पत्ते बज रहे हैं

चितघटी गांव में दो साल पहले प्रधान ने 4 चार हाथपंप लगवाए थे। लेकिन सभी का पानी नीचे चला गया है। 10 मिनट चलने पर भी पानी नहीं आता। गांव से डेढ़ किलोमीटर दूर बना कुंआ 10 साल से लोगों के पत्ते भागने का जरिया बन गया है। गांव में रहते हैं 400 लोग। सभी सुबह-सुबह लाइन बारी-बारी कुंए से पानी साइकिल पर लादकर ले जाते हैं। यहां कभी-कभी पानी के लिए लड़ाई भी हो जाती है।

चितघटी के रहने वाले बोधन के भाई चिराई पानी के कारण गांव छोड़कर पंजाब चले गए। 32 साल बाद शादी न होने पर लोगों की बातें सुनकर चिरई परेशान रहने लगी। एक दिन वो रोज़गार की तलाश में गाँव छोड़कर पंजाब चला गया।

अपने भाई के बारे में बयान बोधन कहते हैं, “घर पर नल न होने और लदान किलोमीटर पानी ढोकर गिरने के चलते 2 बार हमारे भाई की शादी टूट गई। इन सब बातों से वो इतना परेशान हो गया कि एक दिन घर छोड़कर पंजाब चला गया। गेट्स-जाते चिरई कह गया था कि बाहर नौकरी करेंगे। पैसा तो शादी भी हो जाएगी।”

पानी की समस्या शादी के बाद पत्नी छोड़कर चली गई
हम चित्रकूट के पाठा इलाके के 10 गांवों में दयनीय स्थिति को करीब से देखा। इन गांवों में रहने वाली महिलाएं कई किलोमीटर दूर कुंओं से पानी भरकर लाती हैं। महिलाओं ने बताया कि उनका आधा दिन पानी भरने में ही निकल जाता है। यहां कुछ लोग ऐसे भी मिले, जिनके पास पानी की कमी हो गई, क्योंकि उनकी संपत्तियां छोड़ दी गईं।

चित्रकूट के मानिकपुर में जोरामाफी, मारकुंडी और चिटघटी इलाकों की महिलाएं रोजाना 3 किलोमीटर की दूरी पैदल चल रही हैं ऐसे ही पानी प्रमाण हैं।  शकुंतला देवी ने बताया कि सिर पर 15 लीटर की मत का लादकर 4 बार लानी पड़ती है।  पानी लाते-लाते शाम तक पैर सूज जाते हैं।

चित्रकूट के मानिकपुर में जोरामाफी, मारकुंडी और चिटघटी इलाकों की महिलाएं रोजाना 3 किलोमीटर की दूरी पैदल चल रही हैं ऐसे ही पानी प्रमाण हैं। शकुंतला देवी ने बताया कि सिर पर 15 लीटर की मत का लादकर 4 बार लानी पड़ती है। पानी लाते-लाते शाम तक पैर सूज जाते हैं।

रानीपुर कल्याणगढ़ गांव के नागेश दुबे की पत्नी साल 2014 से बेटियों के साथ मायके में रह रही है। नागेश कहते हैं, “गाँव में पेट के लिए पानी है न खेत के लिए। दो डिब्बा पानी मिलता है। इसमें काम कैसे चलता है, ये तो भगवान ही जानते हैं। पत्नी को गांव बुलाता हूं, तो आने को तैयार नहीं होती है।”

गोपीपुर के कामता प्रसाद 52 साल के हैं। तीन पहले उनकी पत्री भी उन्हें छोड़ कर चली गई। कामता ने बताया, “हमारे बीच में विवाद हुआ था। कुछ दिन पहले ही पता चला कि वो नहीं रही। हर चुनाव में नेता पानी पर वोट मांगते हैं, लेकिन किसी ने हमारे घर पर 1 नल तक नहीं लगवाया।”

सरकारी हैंडपंप बने शो-पीस

चित्रकूट के गोपीपुर, जरौमफी, मारकुंडी, सरहट, गिदुरहा, कोटा कंदैला, चितघटी, रानीपुर कल्याणगढ़, चुरेह केशरुआ और ऐलेहाहाहा शहरों में कुल 57 हैंडपंप हैं। ये पानी सिर्फ 7 में ही आता है। ये वो हैंडपंप हैं, जो पथरीली नौकरी से दूर हैं। इस शहर में अब तक नलों से पानी नहीं पहुंचा है।

वर्ल्ड बैंक का मैनेजिंग बुंदेलखंड के जल संसाधन: इतिहास से एक सबक- 2018 रिपोर्ट आई। इसमें बताया गया है कि बुंदेलखंड में साल 2013 से 2018 तक औसत से 60% कम बारिश हुई। इसका असर यहां के परिवेशों में भी दिखता है। इन क्षेत्रों में 40% हैंडपंपों और कुंओं का जलस्तर नीचे चला गया। इससे ये पानी देना बंद कर दिया।

अब…
यहां तक ​​आपने रुके हुए बुंदेलखंड की आपबीती जानी, अब फाइलों के जरिए जमीन को जान लेते हैं…

यूपी में 2.64 करोड़ घरों में नल से पानी पहुंचेगा
केंद्र सरकार की योजना जेजेएम यानी ‘जल जीवन मिशन’ है। इसमें देश के 20 करोड़ घरों में मार्च 2024 तक नल से पानी पहुंचाने का ठेका रखा गया है।

जेजेएम की सरकारी वेबसाइट के मुताबिक, अगस्त 2019 से नवंबर 2022 तक 10 करोड़ घरों में नल से पानी बना। जो अपडेट का आधा हिस्सा है। ऊपर की बात करें तो यहां 2 करोड़ 64 लाख 29 हजार 214 घरों में नल से पानी जुड़ा जा रहा है। अभी तक 53 लाख 27 हजार 820 घरों को कवर किया गया है। हम जिन गांवों में गए, वहां अब तक नल से जल योजना नहीं पहुंची।

आइए अब जल जीवन मिशन में स्टेट की स्टेटमेंट रेट्स देखते हैं…

पथरीली में और विविधता की कमी बन रही रुकावट
चित्रकूट में जल-जीवन मिशन के नोडल ऑफिसर सुनंदू सुधाकरण कहते हैं, “पिक्चर्स के चारों ओर नल से जल पहुंचने में देरी की 2 मुख्य वजहें हैं। पहला: यहां की 50% पथरीली जमीन। दूसरा: काम का ठेका लेने वाले ताले ने देर से काम करना शुरू किया।”

सुधाकरण कहते हैं, “स्कीमों की शुरुआत के बाद दस्तावेज़ों ने क्षेत्रों में मैनपावों को भी देर से लगाया गया। जब प्रशासन ने काम लेट होने पर पैनाल्टी लगाई, तब दफ्तरों ने लेबरों को आगाह किया। अभी घरों में नल से जल पहुंचने के लिए पाइपलाइन का काम हो रहा है।”

जल जीवन मिशन की प्रगति देख भड़क गए जल निगम के एमडी

चित्रकूट में जल जीवन मिशन की परियोजना जायजा मुख्य सचिव अनुराग श्रीवास्तव और जल निगम के एमडी बलकार सिंह को लेते हैं।  तस्वीर 16 नवंबर की है।

चित्रकूट में जल जीवन मिशन की परियोजना जायजा मुख्य सचिव अनुराग श्रीवास्तव और जल निगम के एमडी बलकार सिंह को लेते हैं। तस्वीर 16 नवंबर की है।

16 नवंबर को जेजेएम के प्रोग्रेस के मुख्य सचिव ग्रामीण सतर्कता विभाग के चित्रांकन श्रीवास्तव और जल निगम के एमडी बलकार सिंह पहुंचे। योजना की धीमी गति देख वो लोग पर मौजूद अधिकारी भड़क गए। उन्होंने मिशन में काम कर रही निजी एजेंसियों को बर्खास्त करने की चेतावनी तक दी।

जल निगम के एमडी डॉ. बलकार सिंह ने बताया, “गाँवों में जन जीवन मिशन संदेश के लिए काम कर रही ऐजेंसियों के पास लेबर की कमी है। हमने निर्देश दिया कि मैन पावर को दो बार छोड़ दें। कम समय में ज्यादा से ज्यादा बुजुर्गों को कवर किया जाए। इस पर रात की पाली में भी काम चालू रहेगा।”

सूखे बुंदेलखंड तक पानी पहुंचाने वाली 3 बड़ी कोशिशें
बुंदेलखंड के सूखे आतंकित लोगों तक पानी पहुंचाने के लिए जल जीवन मिशन पहले प्रयास नहीं करता। 1973 में इंदिरा गांधी से लेकर 2009-10 में कृषि मंत्री रहे पर्वत घाटों ने बांध बुंदेलखंड तक पानी पहुंचने की कई योजनाएं शुरू कीं। लेकिन सभी निरर्थक।

बुंदेलखंड के सूखेग्रस्त इलाके के आसपास के इलाकों में पानी की किल्लत ब्यां दावा करती हैं कि 2 तस्वीरों में देख ले…

खबरें और भी हैं…

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